22 अप्रैल, 2019 को बेंगलुरु में बंगलौर विश्वविद्यालय के 54वें वार्षिक दीक्षांत समारोह के अवसर पर भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

बेंगलूरु | अप्रैल 22, 2019

“सर्वप्रथम, मैं इस संस्थान, जो अपनी उत्कृष्टता के लिए प्रसिद्ध है, से आज स्नातक पाठ्यक्रम पूरा कर रहे छात्रों को हार्दिक बधाई देता हूं।

आज, आप अपने शैक्षणिक जीवन और साथ ही जीवन के एक महत्वपूर्ण मुकाम पर पहुंच गए हैं, जो आपके समर्पण और कड़ी मेहनत के बिना संभव नहीं था।

मैं छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, प्रशिक्षण और मार्गदर्शन प्रदान करके इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए छात्रों को तैयार करने के लिए संकाय सदस्यों की भी सराहना करता हूं।

स्वामी विवेकानंद ने एक बार कहा था कि "शिक्षा का अर्थ है, उस पूर्णता की अभिव्यक्ति, जो सब मनुष्यों में पहले ही से विद्यमान है। "मुझे यकीन है कि आप में से जो आज ज्ञान के इस महान गढ़ के मुख्य द्वार से बाहर निकल रहे हैं, वे अपनी वास्तविक क्षमता का एहसास करेंगे और राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान देंगे।

मेरी प्यारी बहनों, भाइयों और युवाओं,

आज, हमारे विश्वविद्यालयों को नई ज्ञान-मीमांसाएं करने, नई क्षमताएं हासिल करने और शिक्षण एवं अनुसंधान के माध्यम से एक बुद्धिमत्तापूर्ण मानव संसाधन पूल बनाने जैसी अनेक भूमिकाएँ निभानी हैं।

उनमें भारत की उच्चतर शिक्षा प्रणाली को एक नई दिशा प्रदान करने की शक्ति निहित है। उनके पास भारत को फिर से विश्वगुरु के पद पर आसीन करने की पवित्र जिम्मेदारी है।

उच्चतर शिक्षा ऐसे ज्ञानवान नागरिकों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, जिनमें महत्वपूर्ण चेतना का समावेश होता है जो किसी लोकतांत्रिक राष्ट्र की सबसे अहम आवश्यकता है।

विविध विशेषज्ञता प्राप्त विद्वानों के बीच परस्पर संवादमूलक अकादमिक सह-अस्तित्व को बढ़ावा देने, विषयों के अभिसरण की सुविधा और स्थापित विषयों के इंटरफेस के प्रभावी शिक्षण के लिए महत्वपूर्ण शिक्षण के एक मंच के निर्माण पर फिर से बल देने की आवश्यकता है। आखिरकार यह युग अंतर्विषयक अधिगम का युग है।

पिछले कुछ दशकों में, विषयगत सीमाओं से परे जाकर हुए शोधों के परिणामस्वरूप भौतिक, प्राकृतिक और सामाजिक विज्ञानों से आगे ज्ञान के कई गैर-पारंपरिक क्षेत्र उभरे हैं। इस प्रकार विषय परस्पर निकट आ रहे हैं ।

उच्चतर शिक्षा प्रणाली को युवाओं को मौजूदा तकनीकी-पूंजीवादी विश्व प्रणाली और इसकी ज्ञान अर्थव्यवस्था के उपयुक्त बनाने के लिए पर्याप्त रूप से सक्षम बनाने के लिए तैयार करना चाहिए।

ज्ञान सम्पदा का उपयोग और सृजन करने के लिए किसी राष्ट्र की क्षमता का निर्धारण इसके नागरिकों को उनकी संभावित क्षमता का पूर्ण रूप से पता लगाने के लिए सक्षम करने से होता है।

आज भारत में विश्व में सबसे अधिक युवा हैं और इसलिए विश्व अर्थव्यवस्था में ये सबसे बड़ी श्रम शक्ति का योगदान देते हैं। विकास के ज्ञान उन्मुख प्रतिमान के अनुसरण से भारत अपने जबरदस्त जनसांख्यिकीय लाभ का फायदा उठा सकेगा।

लेकिन चुनौतियां कठिन हैं जिन्हें दूर करने की जरूरत है।

सबसे बड़ी चुनौती सभी के लिए उच्चतर शिक्षा की वहनीयता और सुगमता को सुनिश्चित करना है। शिक्षा के व्यावसायीकरण और ज्ञान के वस्तुकरण के कारण अभिगम समता दांव पर है।

जहां तक उच्चतर शिक्षा का सवाल है, यह जरूरी है कि सामाजिक समानता और लैंगिक समानता के सिद्धांत सर्वोपरि हों।

यह समाज के सभी वर्गों के लिए सुलभ होनी चाहिए और इसे जाति, पंथ, धर्म और लैंगिक बाधाओं को पार करना होगा।

शैक्षणिक प्रथाओं और पाठ्यचर्या की रूपरेखाओं को शिक्षकों को समालोचना करने, समालोचक बनने के लिए तैयार होना चाहिए और उन्हें अपरिचित क्षेत्रों में खुद को झोंकने की कीमत पर भी सीखना चाहिए।

राष्ट्रीय ज्ञान आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्तमान में भारत में उच्चतर शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात 27% है जबकि संयुक्त राज्य अमरीका और चीन में यह अनुपात क्रमशः 85.8% और 43.4% है।

यह सांख्यिकीय निरूपण उच्चतर शिक्षा से संबंधित हमारी क्षमताओं के अल्प-उपयोग एक संकेतक है।

एक ओर जहां उच्चतर शिक्षा क्षेत्र में बढ़ती शैक्षिक आवश्यकताओं को पूरा करने की आवश्यकता है, वहीं केवल संख्याओं को जोड़ने से यह उद्देश्य पूरा नहीं होगा। समय की आवश्यकता है कि हम सकल नामांकन अनुपात को बढ़ाने की दिशा में तेजी से प्रगति करते हुए, वैश्विक मानकों के अनुरूप गुणवत्तायुक्त शिक्षा प्रदान करें।

जहाँ तक उच्चतर शिक्षा का संबंध है हम अति प्राचीन काल से अपनी शानदार विरासत के बारे में जानते हैं ।

नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्व प्रसिद्ध विश्वविद्यालय 'भारतवर्ष' में ही फले-फूले। ऐसा कहा गया कि इन ऐतिहासिक विश्वविद्यालयों में 10000 छात्रों के लिए 1500 शिक्षक थे। अनुवादकों की एक उत्कृष्ट टीम के माध्यम से ज्ञान के प्रलेखन ने दुनिया के विभिन्न हिस्सों से विद्वानों को अध्ययन करने, शिक्षण करने और अनुसंधान करने के लिए सक्षम बनाया।

भास्कर जैसे महान गणितज्ञ और वराहमिहिर जैसे खगोलशास्त्री ने भारत को ज्ञान की राजधानी बनाया।

भारत को बीते युग के इस गौरव को फिर से प्राप्त करना होगा और ऑन लाइन पाठ्यक्रमों के विस्तार, मैसिव ओपन ऑन लाइन कोर्सिस (एमओओसी) और दूरस्थ शिक्षा आदि के जरिये उच्चतर शिक्षा के डिजिटाइजेशन जैसी पहलों के माध्यम से ज्ञान के सृजन और प्रसार का कार्य बड़े पैमाने पर करना होगा।

डिजिटल क्रांति को सभी के लिए उच्चतर शिक्षा की व्यापक पहुंच को संभव बनाना चाहिए और 'स्किल, रीस्किल एंड अनस्किल' की त्रि-आयामी कार्य नीति और साथ ही साथ ‘लर्न, रीलर्न और अनलर्न’ को शामिल करके कौशल आधारित शिक्षा पर अधिक जोर दिया जाना चाहिए।

भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान और जीवविज्ञान जैसे प्राकृतिक विज्ञानों का एक मजबूत आधार बनाने के माध्यम से एक मजबूत नींव रखने से वैज्ञानिक मनोवृत्ति को बढ़ावा मिलेगा और वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए एक अनुकूल माहौल पैदा होगा। हमारे स्वदेशी ज्ञान और चिकित्सा को पेटेंट कराना भी महत्वपूर्ण है।

मैं हमारी उच्चतर शिक्षा में आमूल-चूल बदलाव और सुधार किये जाने की जरूरत पर जोर देता रहा हूं ताकि हमारी संस्थाएं न केवल वैश्विक ज्ञान का केन्द्र बनें बल्कि यह भी सुनिश्चित किया जा सके कि इन संस्थानों से उत्तीर्ण होने वाले छात्र रोजगार के मोर्चे पर आने वाली चुनौतियों का सामना करने में सक्षम हों ।

हमें अपनी उच्चतर शिक्षा प्रणाली में बदलाव लाना चाहिए और विश्व स्तरीय शैक्षणिक स्थलों का सृजन करना चाहिए जो हमारे छात्रों की बौद्धिक क्षमताओं का पोषण करें और विश्व अर्थव्यवस्था में सर्वश्रेष्ठ मानव संसाधनों का योगदान दें।

अद्भुत अवसर आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं और आपको अपने अर्जित ज्ञान और कौशल का सर्वोत्तम संभव उपयोग करना चाहिए। आपको आजीवन शिक्षार्थी होना चाहिए और हमारे समय के जटिल मुद्दों को सुलझाने के लिए नित नए कौशल प्राप्त करते रहना चाहिए।

मैं आप सभी से पथ-प्रदर्शक बनकर इस दुनिया में अपनी छाप छोड़ने का प्रयास करने का आग्रह करता हूं।

यह हमारे समकालीन उत्तर-आधुनिक संदर्भ में महत्वपूर्ण है कि हम अपनी क्षेत्रीय 'भाषाओं' और मातृभाषा के संरक्षण और विकास के लिए प्रयास करते रहें। हमारी भाषाई और सांस्कृतिक विरासत तथा विविधता को संरक्षित करना महत्वपूर्ण है।

साथ ही वैश्विक संदर्भ में अंग्रेजी में दक्षता हासिल करना नितांत आवश्यक हो गया है।

मेरे प्यारे युवा मित्रों,

जब आप इस संस्थान से उत्तीर्ण होकर बाहर निकलेंगे और अपना करियर शुरू करेंगे तो आप पाएंगे कि टीम वर्क के साथ व्यक्तिगत प्रयास आपको सफलतम बनाने और आपके पेशेवर करियर में महत्तवपूर्ण उपलब्धि हासिल करने के लिए आपका मार्गदर्शन करेगा।

मुझे यकीन है कि यह संस्था उच्च गुणवत्तायुक्त शिक्षा प्रदान करने और एक कुशल युवा शक्ति, जो एक वैश्विक नेता के रूप में वैश्विक मामलों के शीर्ष पर भारत को उसके सही स्थान पर ले जाने के लिए पूरी तरह से सुसज्जित और सक्षम है, को प्रोत्साहित करने में अधिक से अधिक ऊंचाइयों को प्राप्त करेगी।

एक बार फिर, मैं सभी स्नातक छात्रों, उनके माता-पिता और शिक्षकों को बधाई देता हूं और इस विश्वविद्यालय के लिए अपनी शुभकामनाएं देता हूं।

धन्यवाद!

जय हिन्द!"