15 अप्रैल, 2019 को नई दिल्ली में इंटरनेशनल काउंसिल फॉर लोकल एनवायर्नमेंटल इनिशिएटिव्स द्वारा आयोजित 4-रेजिलिएंट सिटीज एशिया-पैसिफिक कांग्रेस 2019 के उद्घाटन समारोह के अवसर पर भारत के माननीय उपराष्ट्रपति, श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

नई दिल्ली | अप्रैल 15, 2019

“एशिया के कई शहरों और विश्व के अन्य हिस्सों से आए नेताओं/व्यवसायिकों, नीति निर्माताओं और शोधकर्ताओं की इस महत्वपूर्ण सभा को संबोधित करते हुए मुझे अत्यंत प्रसन्नता हो रही है।

मैं आप सभी का भारत - एक ऐसा देश जिसने पारंपरिक रूप से प्रत्येक प्राणी को एक मित्र के रूप में देखा है - में हार्दिक स्वागत करता हूं। जैसा कि प्राचीन भारतीय ग्रंथ ऋग्वेद में लिखा है,

"मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणी भूतानि समीक्षे मित्रस्य चक्षुषा समीक्षाम हे"

“एक मित्र की नज़र से प्रकृति के हर तत्व को देखो। हम एक दूसरे को एक मित्र की नज़र से देखें"।

मैं समझता हूं कि हम आज यहां अपने सामने मौजूद सबसे गंभीर चुनौती - जलवायु परिवर्तन पर विचार-विमर्श करने के लिए एकत्रित हुए हैं।

मुझे आशा है कि आपके द्वारा की गई चर्चा से इस चुनौती को बेहतर ढंग से समझा जा सकेगा और सामूहिक कार्रवाई के लिए वैकल्पिक मार्ग को खोजा जा सकेगा।

जलवायु परिवर्तन का प्रभाव विशेष रूप से एशिया में हमारे शहरों और कस्बों के लिए प्रासंगिक है। बाढ़, चक्रवात, जंगलों में लगने वाली आग और तूफान लगभग नियमित रूप से जीवन को बाधित करते हैं।

तापमान बढ़ रहा है और शहरों में गर्मियों में सूखे जैसी स्थिति उत्पन्न हो रही है। शहरों में पानी की कमी एक स्थायी चुनौती हो गई है। हमारे शहर दिन प्रतिदिन जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से जूझ रहे हैं।

मुझे गर्व है कि भारत अब इस चुनौती का सामना करते हुए इस समस्या को सुलझाने वाले विश्व के अग्रणी देशों में से एक है। जैसा कि हाल ही में पोलैंड के कटोविस में जलवायु परिवर्तन पर पार्टियों के 24 वें सम्मेलन में घोषणा की गई है, हमारा देश राष्ट्रीय स्तर पर हमारे द्वारा तय किए गए निर्धारित योगदानों को प्राप्त करने की ओर अग्रसर है।

आर्थिक विकास के लिए पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखा जाना चाहिए। जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम होनी चाहिए।

भारत ने 2022 तक 175 गीगा वाट अक्षय ऊर्जा के उत्पादन के एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य को निर्धारित किया है। यह देखते हुए कि हम पहले से निर्धारित लक्ष्य को पार करने की दिशा में अग्रसर हैं, इस लक्ष्य को अब 227 गीगावॉट अक्षय ऊर्जा क्षमता तक बढ़ा दिया गया है।

प्रिय बहनों और भाइयों, यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि सभी विकास रणनीतियों में जलवायु संवेदनशीलता और संभावित प्रभावों पर विचार किया जाना चाहिए।

यदि ग्लोबल वार्मिंग मौजूदा दर से बढ़ती रही तो 2030 और 2052 के बीच इसके 1.5 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने की संभावना है। वैश्विक स्तर पर, यदि हम विकास के वर्तमान ढंग को जारी रखते हैं, तो निश्चित रूप से हम आने वाले 30 वर्षों में 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा को पार कर जाएंगे।

वैश्विक तापमान में इस वृद्धि के परिणामस्वरूप अधिकांश भूस्थलीय और महासागरीय क्षेत्रों के औसत तापमान में वृद्धि, अधिकांश बसे हुए क्षेत्रों में चरम सीमा पर गर्मी, कई क्षेत्रों में भारी वर्षा और कुछ क्षेत्रों में सूखे और अल्प वर्षा की संभावना है। जलवायु-अनुकूलन के उपायों को बढ़ाकर भविष्य के जलवायु-संबंधी खतरों को कम किया जा सकता है।

प्रिय बहनों और भाइयों, दुनिया की 60% से अधिक आबादी एशिया में रहती है। इस आबादी का लगभग आधा हिस्सा शहरों और कस्बों में रहता है। यह ऐसा क्षेत्र है जो प्राकृतिक आपदाओं से सबसे अधिक प्रभावित होता है। इन वास्तविकताओं के मद्देनज़र, एशिया में सरकारों को जलवायु अनुकूलन समुदायों का निर्माण करना चाहिए।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, "ग्लोबल वार्मिंग बढ़ने के कारण लाखों लोग तटीय बाढ़ और इससे संबंधित प्राकृतिक आपदाओं की चपेट में आ जाएंगे। इसके अलावा, सबसे गरीब देश और लोग इस खतरे के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील होंगे और वे ही सबसे पहले और सबसे ज्यादा पीड़ित होंगे।" खराब अनुकूलन क्षमता से ऊर्जा आपूर्ति, गतिशीलता, अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य और हमारा सामान्य जीवन बाधित होगा।

शहरीकरण के हर पहलू को स्थिरता के साथ जोड़ना अत्यंत महत्वपूर्ण है। शहरों का वैश्विक ऊर्जा मांग में दो-तिहाई और कार्बन उत्सर्जन में 70% हिस्सा है। जहां 2050 तक वैश्विक स्तर पर शहरीकरण के 67% तक पहुंचने की उम्मीद है, वहीं ये शहर आर्थिक विकास के केंद्र होंगे और यह संभावना है कि ये वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में 80% योगदान देंगे। अत:, शहरों को विशेष रूप से एशिया में उभरती अर्थव्यवस्थाओं में निम्न-कार्बन अर्थव्यवस्था में परिवर्तित होने के लिए आगे आने की आवश्यकता है।

हमें विकास को मापने के पारंपरिक मानदंडों को छोड़कर, अपने विकास प्रतिमान को बदलने और जलवायु अनुकूलन विकास के लक्ष्य को हासिल करने की आवश्यकता है। नया शहरी बुनियादी ढांचा निम्न-कार्बन, हरित और जलवायु अनुकूलन के अनुसार होना चाहिए।

हमारे पास समय बहुत कम है और हमें अभिनव समाधानों की आवश्यकता है जो शहरों को विकास, स्थिरता और जलवायु अनुकूलन की तिकड़ी, जो अब तक दुष्प्राप्य बनी हई है, को प्राप्त करने में मदद करेंगे।

मैं यहां मौजूद सभी शहरों, प्रदेशों और देश के प्रतिनिधियों से आह्वान करता हूं कि वे कम उत्सर्जन वाले विकास को सुनिश्चित करने के लिए, सतत विकास हेतु संयुक्त राष्ट्र कार्यक्रम के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अपने प्रयास के एक हिस्से के रूप में विभिन्न बहुआयामी और नवोन्मेषी दृष्टिकोणों को अपनाएं। जलवायु अनुकूलन शहरी विकास को प्राप्त करने के लिए हरित अवसंरचना को प्रोत्साहित करना, एक चक्रीय अर्थव्यवस्था को सक्षम बनाना और संसाधनों की दक्षता को बढ़ावा देना समय की मांग है।

शहरों को बुनियादी सेवाओं और पर्याप्त आवास तक लोगों की पहुंच बढ़ानी चाहिए और वायु प्रदूषण, भीड़भाड़, यातायात दुर्घटनाओं को कम करने और कचरे के बेहतर प्रबंधन, सार्वजनिक परिवहन के लिए बेहतर बुनियादी ढांचे में निवेश, स्वच्छ ऊर्जा के साथ-साथ हरे-भरे सार्वजनिक स्थल बनाने के लिए शहरों की पुन: संरचना करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

एशियाई शहरों को जैव विविधता और स्वस्थ, कार्यशील पारिस्थितिकी तंत्र बनाने पर जोर देना चाहिए। शहरों में प्रदूषण खतरनाक स्तर तक पहुंचने के कारण, स्वच्छ और हरित प्रौद्योगिकियों के संवर्धन को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। नगर प्रशासन को स्थानीय जल निकायों की सुरक्षा पर ध्यान देना चाहिए और दुर्लभ जल संसाधनों के संरक्षण के लिए कदम उठाने चाहिए।

ई-मोबिलिटी और सार्वजनिक परिवहन को प्रोत्साहित करने पर जोर होना चाहिए।

प्रिय बहनों और भाइयों,

मुझे पता है कि शहरीकरण और भावी रुझानों के मौजूदा पैमाने को देखते हुए वित्तीय उपलब्धता के मामले में शहरों को एक बड़ी बाधा का सामना करना पड़ता है। सार्वजनिक निजी भागीदारी को सक्षम बनाना, स्थानीय बैंकिंग संस्थानों को शामिल करना, मिश्रित वित्त मॉडल, नगरपालिका बॉन्ड और ग्रीन बॉन्ड, सभी वित्तीय उपलब्ध्ता बढ़ाने के लिए प्रभावी साधन हैं।

हमारे सामने बड़ी चुनौती है। यह एक ऐसी चुनौती है जो प्रत्येक बीतते दिन के साथ और अधिक विकट होती जाएगी। समय सीमित है। नीति निर्माताओं के लिए अक्टूबर 2018 में जारी जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल (आईपीसीसी) का सारांश यह है कि 2030 से पहले ग्रीनहाउस गैस (जीएचजी) उत्सर्जन को 45% तक कम करना होगा।

यह एक चुनौतीपूर्ण कार्य है लेकिन असंभव नहीं है। एक हालिया रिपोर्ट का अनुमान है कि वैश्विक स्तर पर चक्रीय अर्थव्यवस्था को लागू करने से पेरिस समझौते का लक्ष्य प्राप्त हो सकता है।

चक्रीय अर्थव्यवस्था की रणनीतियों, जैसे कि किसी देश के ऊर्जा कार्यक्रम में अक्षय ऊर्जा के स्रोतों की हिस्सेदारी बढ़ाना, ऊर्जा दक्षता में सुधार करना, को लागू करने की आवश्यकता है।

प्रिय बहनों और भाइयों, हम सभी पर यह बड़ी जिम्मेदारी है कि हम सतत विकास को अपना मुख्य लक्ष्य बनाएं और पृथ्वी को बेहतर बनाएं, ताकि हमारी भावी पीढ़ी का भविष्य किसी भी तरह से खतरे में न पड़े।

हमारे सभी नागरिकों, विशेषकर शहरों में रहने वाले लोगों हेतु एक उज्जवल भविष्य सुनिश्चित करने के लिए, हमें ग्रामीण-शहरी विभाजन को कम करने और परिवर्तन के पुरोधा के रूप में सभी लोगों को शामिल करने पर भी ध्यान देना चाहिए।

इसी के साथ, हमें उत्पादन और उपभोग के अस्थिर स्वरूप से होने वाले खतरों को पहचानना चाहिए।

जैसा कि महात्मा गांधी ने कई साल पहले कहा था: "पृथ्वी के पास हमारी जरूरत के लिए पर्याप्त संसाधन हैं, लेकिन हमारी लालच के लिए नहीं।" हमें एक ऐसी जीवन शैली को बढ़ावा देना चाहिए जो स्थिरता और पर्यावरणीय स्वच्छता को प्रमुखता दे।

हमें अपनी सांस्कृतिक जड़ों, विशेष रूप से सभ्यतागत मूल्यों से प्रेरणा लेनी चाहिए जो प्राकृतिक संसाधनों का सम्मान करते हैं और इसकी रक्षा करने का संदेश देते हैं। जैसा कि प्राचीन भारतीय ऋषियों ने ऋग्वेद में कहा था: "पर्यावरण को नुकसान मत पहुँचाओ; पानी और पेड़ पौधों को नष्ट मत करो ; पृथ्वी मेरी माँ है, मैं उसका बेटा हूँ; पानी सदा निर्मल बना रहे; पानी को नष्ट मत करो"।

जहाँ तक विकास का संबंध है, हमें इसके लिए नए तौर तरीके खोजने होंगे। हमें हरित समाधान अपनाने, सुशासन प्रदान करने और शहरों को इस तरह ढालने का प्रयास करना चाहिए। हमें अपने तय कार्यक्रम पर आगे बढ़ने के लिए सार्थक सार्वजनिक-निजी भागीदारी के जरिए सामूहिक रूप से एकजुट होना चाहिए।

मुझे उम्मीद है कि यह मंच एशिया पैसेफिक क्षेत्र में प्रगति की गति को तेज़ करने के लिए नए विचार सामने लाएगा। मैं इस सम्मेलन के कुछ प्रमुख निष्कर्षों के बारे में जानने के लिए उत्सुक हूं।

जय हिन्द!"