04 अप्रैल, 2019 को नई दिल्ली में राष्ट्रपति का सम्मान प्रमाण-पत्र और महर्षि बद्रायन व्यास सम्मान पुरस्कार प्रदान करने के उपरांत भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

नई दिल्ली | अप्रैल 4, 2019

“मैं आज प्रख्यात भाषाविदों और विद्वानों के बीच उपस्थित होकर और प्राचीन भाषाओं के संरक्षण और विकास हेतु उनकी सेवा के लिए उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार सम्मान प्रदान करके वास्तव में धन्य हो गया हूं।

मैं उन सभी सुप्रसिद्ध विद्वानों का दिल से स्वागत करता हूं जो इस पारंपरिक ज्ञान को जीवित रखे हुए हैं और जो अतीत व वर्तमान के बीच बौद्धिक सेतु के रूप में काम कर रहे हैं।

महान भारतीय कवि आचार्य दंडी ने कहा था कि यह सम्पूर्ण भुवन अंधकारपूर्ण हो जाता, यदि संसार में शब्द-स्वरूप ज्योति अर्थात् भाषा का प्रकाश न होता ।

भाषा बौद्धिक और भावनात्मक अभिव्यक्ति का साधन है।

भाषा एक प्रकार से संस्कृति, वैज्ञानिक जानकारी और विश्व मत को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक संचारित करने का माध्यम है ।

यह महत्वपूर्ण, अनदेखा धागा है जो अतीत को वर्तमान से जोड़ती है।

यह मानव विकास के साथ विकसित होती है और निरंतर उपयोग से पोषित होती है।

मैंने हमेशा अपनी भाषायी विरासत की संरक्षा और संरक्षण के महत्व पर जोर दिया है। हमारी भाषाएं हमारे इतिहास, हमारी संस्कृति और एक समाज के रूप में हमारे विकास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। वास्तव में, वे हमारी पहचान, परंपराओं और रीति-रिवाजों को परिभाषित करती हैं। वे लोगों के बीच मेलभाव बनाने और उन्हें मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

हमारा देश बहुभाषी है, जहाँ 19,500 से अधिक भाषाएँ या बोलियाँ बोली जाती हैं। तथापि, लगभग 97 प्रतिशत आबादी 22 अनुसूचित भाषाओं में से एक भाषा बोलती है।

आधुनिक भारतीय भाषाओं की जड़ें पुरानी हैं और एक तरीके से उनकी प्राचीन भाषाओं से व्युत्पत्ति हुई है ।

प्राचीन भाषाएं हमारे अतीत को, गत वर्षों के सभ्यतागत मूल्यों को, हमारे प्राचीन विचारकों, वैज्ञानिकों, कवियों, संतों, चिकित्सकों, दार्शनिकों और शासकों के ज्ञान और बुद्दिमता को दर्शाती हैं।

यदि हम इस कड़ी को संरक्षित और बनाए नहीं रखते हैं, तो हम विरासत में मिले इस खजाने की कीमती चाबी को खो देंगे।

विशेषज्ञों द्वारा किए गए अध्ययनों से अनुमान लगाया गया है कि करीब 600 भाषाएं लुप्त होने के कगार पर हैं और 250 से अधिक भाषाएं पिछले 60 वर्षों में लुप्त हो चुकी हैं।

जब एक भाषा लुप्त होती है, पूरी संस्कृति खत्म हो जाती है। हम ऐसा होते नहीं देख सकते। भाषाओं सहित अपनी सांस्कृतिक विरासत की रक्षा करना हमारा संवैधानिक कर्तव्य है। प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन करना और उन्हें आधुनिक श्रोताओं के लिए प्रचारित करना समय की मांग है। मुझे खुशी है कि आज हम उन विद्वानों को पहचान पा रहे हैं जो इस पवित्र मिशन में लगे हुए हैं।

चूंकि प्राचीन भाषाओं और साहित्य के अध्ययन से इतिहास के प्रामाणिक स्रोतों तक पहुंचा जा सकता है , इसलिए श्री अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधान मंत्री रहते राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन की स्थापना की गई थी।

इस मिशन का मुख्य उद्देश्य भारत में अपार पांडुलिपि सम्पदा का पता लगाना और उन्हें संरक्षित करने के लिए आधुनिक और स्वदेशी तकनीकों का उपयोग करना है। यह अनुमान है कि भारत में लगभग 10 मिलियन पांडुलिपियां हैं, जो शायद दुनिया का सबसे बड़ा संग्रह है।

प्राचीन ग्रंथों का संरक्षण केवल पहला कदम है। हमें विद्वानों को इन प्राथमिक स्रोतों का उपयोग करके अनुसंधान करने और ज्ञान के नए आयामों का पता लगाने के लिए प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। हमें ज्ञान को बढ़ाते रहना चाहिए और अपने वर्तमान एवं भविष्य को रोशन करना चाहिए।

मुझे यह जानकर खुशी हुई कि भारत सरकार की यह योजना विभिन्न प्राचीन भाषाओं के विकास के लिए भारत और विदेश दोनों में समर्पित विद्वानों को पुरस्कृत करने के लिए है।

मुझे बताया गया है कि योजना का उद्देश्य संस्कृत, पाली, प्राकृत, अरबी, फारसी, प्राचीन तेलुगु, प्राचीन कन्नड़, प्राचीन उड़िया और प्राचीन मलयालम भाषाओं के विद्वानों और प्रतिभाशाली विद्वानों के जीवन भर के काम को मान्यता प्रदान करना है।

प्रिय बहनों और भाइयों,

भाषा संरक्षण और विकास के लिए एक बहु-आयामी नीति की आवश्यकता है।

यह प्राथमिक विद्यालय स्तर पर शुरू होना चाहिए और उच्चतर शिक्षा तक जारी रहना चाहिए। कम से कम एक भाषा में कार्यात्मक साक्षरता सुनिश्चित की जानी चाहिए।

अधिक से अधिक लोगों को अपनी मूल भाषाओं का उपयोग घर में , समुदाय में, बैठकों में और प्रशासन में करना शुरू करना चाहिए। अधिकाधिक लोगों को इन भाषाओं में कविताएं, कहानियां, उपन्यास और नाटक लिखने चाहिए। हमें इन भाषाओं में बोलने, लिखने और संवाद करने वालों में प्रतिष्ठा और स्वाभिमान के बोध को स्वीकार करना चाहिए। हमें भारतीय भाषा के प्रकाशनों, पत्रिकाओं और बच्चों की पुस्तकों को प्रोत्साहित करना चाहिए। बोलियों और लोक साहित्य पर पर्याप्त ध्यान दिया जाना चाहिए।

समावेशी विकास के लिए भाषा को एक उत्प्रेरक बनना चाहिए।

भाषा का प्रचार सुशासन का एक अभिन्न अंग होना चाहिए।

बहनों और भाइयों,

आज हम तेजी से बदलती दुनिया में जी रहे हैं जिसमें तकनीक हमारे जीने और काम करने के तरीके को बदल रही है। हमें अपनी भाषाओं और संस्कृति को संरक्षित करने और बढ़ावा देने के लिए प्रौद्योगिकी की शक्ति का उपयोग करना चाहिए।

मुझे खुशी है कि आज हम उस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठा रहे हैं।

मुझे लिंग्विस्टिक डेटा रिसोर्सिज फॉर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जारी करने में खुशी हो रही है।

यह हमारे मौजूदा सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) संरचना में एक बहुत बड़ी खाई को पाटता है।

कई भारतीय भाषाओं के लिए भाषा प्रौद्योगिकी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित उपकरण विकसित करने के लिए आवश्यक संसाधन अपर्याप्त या अनुपलब्ध हैं। इस कमी को दूर करने के लिए, भारत सरकार ने 2008 में भारतीय भाषा लिंग्विस्टिक डेटा कंसोर्टियम फॉर इंडियन लैंगविजिज (एलडीसी-आईएल) योजना शुरू की है और भारत की सभी अनुसूचित भाषाओं में पिछले ग्यारह वर्षों से उच्च गुणवत्ता वाले भाषायी संसाधन तैयार कर रही है।

आज हम 19 अनुसूचित भारतीय भाषाओं में 31 बड़े पाठ और भाषण डेटासेट जारी कर रहे हैं। ये सार्वजनिक क्षेत्र में अब तक उपलब्ध इन भाषाओं के लिए सबसे बड़ा संग्रह हैं।

इसके साथ-साथ, मुझे खुशी है कि एक डेटा डिस्ट्रीब्यूशन पोर्टल भी शुरू किया जा रहा है, जहाँ आने वाले दिनों में कई तरह के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित तकनीकों जैसे कि स्वत: श्रुतलेख, भाषा पहचान, भाषा समझ, मशीन द्वारा अनुवाद, व्याकरण और वर्तनी जांच का उपयोग करके और अधिक तथा विविध डेटासेट जोड़े जाएंगे ।

एक तरफ ये डेटासेट अकादमिक और लाभ-रहित अनुसंधान संगठनों के लिए मुफ्त में उपलब्ध हैं, दूसरी तरफ ये बहुत ही किफायती लागत पर उद्योगों के लिए भी उपलब्ध हैं।

मुझे यकीन है कि इन संसाधनों के जारी होने से भारतीय भाषाओं में अत्याधुनिक आईटी उपकरणों की उपलब्धता के लिए नए युग की शुरुआत हुई है और यह डिजिटल डोमेन में भाषा की बाधा दूर होगी।

प्रिय दोस्तों, हमारा जीवन हर स्तर पर दैनिक आधार पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) से प्रभावित होता है।

यदि हम एआई का उपयोग कर सकते हैं और स्थानीय भाषाओं में क्षमताओं और उपकरणों का निर्माण कर सकते हैं, तो यह निश्चित रूप से ज्ञान अर्जन और साथ ही ज्ञान संरक्षण और विकास को लोकतांत्रिक बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

हमारे पास विभिन्न भाषाओं में बोलने वाले हमारे सभी लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए स्थानीय भाषाओं में संचार के लिए कई और प्रौद्योगिकीय उपकरण होने चाहिएं।

“डिजिटल इंडिया” का मिशन साक्षर भारत और समावेशी ज्ञानवान समाज के लिए एक मिशन हो सकता है।

भारतीय भाषाओं में भाषायी संसाधन उपलब्ध कराने के लिए केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान सराहनीय कार्य कर रहा है। मुझे आशा है कि वे नए उत्साह के साथ इन प्रयासों को जारी रखेंगे।

19 अनुसूचित भाषाओं में कुल 31 डेटासेट वर्तमान में डाउनलोड के लिए उपलब्ध हैं। मुझे उम्मीद है कि सभी तकनीकी और शोध संस्थान, स्टार्ट-अप्स और शोधकर्ता इन डेटाबेस का लाभ उठा पाएंगे।

मैं एक बार फिर सभी प्रतिष्ठित विद्वानों को बधाई देना चाहता हूं। मानव संसाधन विकास मंत्रालय और भारतीय भाषाओं के संरक्षण, प्रचार और लोकप्रियकरण में लगे संस्थानों को मेरी शुभकामनाएं।

मैं आप सभी विद्वत्जनों को राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित होने की हार्दिक बधाई देता हूं।

बहनों और भाईयों

भारतीय परंपरा में माना गया है कि सृष्टि का निर्माण ही शब्दनाद से हुआ है। मानव का व्यक्तित्व और विचार संसार भाषा से ही बनते हैं।

भाषाई विविधता का अपना सौंदर्य है। भाषाओं के उपवन में ही विचारों और अभिव्यक्ति के फूल खिलते हैं। किसी भाषा के समाप्त होने के साथ एक संस्कृति, उसका संस्कार बोध विलुप्त होता है। मानव चेतना की विकास श्रृंखला में एक अपूरर्णीय रिक्तता आती है।

यदि हम विदेशी भाषाएं सीख सकते हैं तो हम भारतीय भाषाओं को कहीं आसानी से सीख सकते हैं। उनके समृद्ध साहित्य को आसानी से समझ सकते हैं। साहित्य अकादमी, नेशनल बुक ट्रस्ट जैसी संस्थाओं को विभिन्न भारतीय भाषाओं के श्रेष्ठ साहित्य का सरल, सुगम अनुवाद उपलब्ध कराना चाहिए।

हमारे संस्कार एक हैं, हमारी संवेदनाऐं समान हैं। सदियों का सांस्कृतिक आदान प्रदान हमारी प्राचीन भाषाओं के साहित्य में झलकता है।

सम्मानीय विद्वत्जन,

भारत की अद्भुत भाषाई विविधता, हमारी साहित्यिक धरोहर के संरक्षण में आपका महत्वपूर्ण सहयोग अपेक्षित है। आप भारत के साहित्यिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के पुरोधा बनें, समाज आपसे मार्गदर्शन की अपेक्षा करता है।

जय हिन्द!”