30 नवंबर, 2017 को नई दिल्ली में वर्ल्ड एसोसिएशन फॉर स्माल एंड मीडिम इंटरप्राइजेज द्वारा आयोजित लघु और मध्यम उद्यमों संबंधी 21वें अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु का अभिभाषण

नई दिल्ली | नवम्बर 30, 2017

मुझे आज यहाँ लघु एवं मध्यम उद्यमों के वैश्विक संघ (डब्ल्यू.ए.एस.एम.ई.) द्वारा आयोजित लघु एवं मध्यम उद्यमों संबंधी 21वें अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन आईसीएसएमई का उद्घाटन करते हुए खुशी हो रही है।

मैं इस अवसर पर डब्ल्यूएएसएमई द्वारा पूर्व में भिन्न-भिन्न देशों में इस प्रकार के 20वें अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों का सफलतापूर्वक आयोजन करने के अनेक प्रयासों की भूरि-भूरि सराहना करता हूँ।

मुझे प्रसन्नता है कि यह प्रतिष्ठित वैश्विक सम्मेलन इस वर्ष भारत में लौटा है। वास्तव में, यह समस्त विश्व में एस.एम.ई. के लिए की गई अनेक महत्वपूर्ण पहलों पर चर्चा करने, विचारों के आदान-प्रदान और विचार-विमर्श का एक महत्वपूर्ण मंच है।

इस महत्वपूर्ण वार्षिक कार्यक्रम में विशिष्ट सम्मानित अतिथियों के रूप में अपने साथ मॉरीशस सरकार के व्यापार, उद्यम और सहकारिता मंत्रालय के माननीय मंत्री श्री सोमिल दत्त भोला तथा बांग्लादेश सरकार के उद्योग मंत्रालय के माननीय मंत्री श्री अमीर हुसैन अमु को पाकर सम्मानित महसूस कर रहा हूँ।

हम जानते हैं कि उभरती अर्थव्यवस्थाओं में औपचारिक एस.एम.ई. कुल रोजगार में 60 प्रतिशत तथा राष्ट्रीय आय (जीडीपी) में 40 प्रतिशत तक का योगदान देते हैं। भारत में, ये हमारे जीडीपी में 45 प्रतिशत का योगदान देते हैं। भारतीय एस.एम.ई. क्षेत्र में लगभग 46 करोड़ लोग कार्यरत हैं जो देश में कृषि क्षेत्र के पश्चात् दूसरा सबसे बड़ा कृतिक बल है जो 115 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर से बढ़ रहा है।

विश्व बैंक के अनुमानों के अनुसार, अगले 15 वर्षों में बढ़ते वैश्विक कार्यबल मुख्यत: एशिया और उप-सहारा अफ्रीका में 600 मिलियन नौकरियों की आवश्यकता होगी। उभरते हुए बाज़ारों में, एस.एम.ई. द्वारा औपचारिक रूप से सबसे ज्यादा नौकरियों का सृजन होता है जिसमें 5 नये स्थानों में 4 का भी सृजन होता है। एस.एम.ई. वैश्विक आर्थिक क्रियाकलाप का मुख्य आधार है और गरीबी उपशमन तथा समावेशी आर्थिक वृद्धि को सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। रोजगार और धन के सृजन के अलावा एसएमई विकास के साम्य वितरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

निस्संदेह, इन्हें वित्त जुटाने और कराधान के मामलों में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। कौशल में कमी, निम्न स्तरीय प्रौद्योगिकी, विनियमन संबंधी जटिलताओं और व्यापार संबंधी बाधाओं के कारण भी इनकी क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। एस. एम. ई. को पेश आ रही चुनौतियों को हल किए जाने की जरूरत है जिससे वे अपनी पूर्ण क्षमता का उपयोग कर सकें और देश की आर्थिक समृद्धि में अपेक्षाकृत बड़ी भूमिका निभा सकें।

इस सम्मेलन का विषय - "लघु एवं मध्यम उद्यमों को बढ़ावा देकर समावेशी और संपोषणीय औद्योगिकीकरण की प्राप्ति" मेरा प्रिय विषय है। आज, जलवायु परिवर्तन और वैश्विक तापन कटु सच्चाई है जो समस्त विश्व में लोगों, जन्तु और वनस्पति जगत को प्रभावित कर रही है। कुछ दशकों पूर्व तक, इन विषयों पर चर्चाएं वैज्ञानिक सम्मेलनों तक ही सीमित रहती थीं क्योंकि आम जनता या तो आनन्दपूर्वक उदासीन रहती थी या फिर इसके विनाशकारी परिणामों के प्रति पूर्णत: सजग नहीं थी। किन्तु शनै-शनै लोगों ने प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध अवक्षय के खतरों को महसूस करना आरंभ कर दिया है और यह कि यह हमेशा ऐसे ही नहीं चल सकता। इस धरती को बनाए रखने तथा समृद्धि के लिए हरित भविष्य को सुनिश्चित करने के लिए एस.एम.ई. ऐसी प्रक्रियाएं अपना कर महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं जो न तो पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव डाले और न ही भावी पीढ़ियों को नुकसान पहुँचाएं।

मैं इस पहल के लिए डब्ल्यू.ए.एस.एम.ई. की सराहना करता हूँ चूँकि संपोषणीय विकास लक्ष्यों (एस.डी.जी.) के साथ एस.एम.ई. विकास की महत्वपूर्ण कार्यसूची को एकीकृत करना पृथ्वी ग्रह को पेश आ रही चुनौतियों पर ध्यान देने और भविष्य के लिए रूपरेखा तैयार करने के लिए महत्वपूर्ण है। यह स्वत: स्पष्ट है कि एस.एम.ई. विकास से संबंधित नीतियों के केन्द्र में संपोषणीयता होनी चाहिए। इसमें कोई संदेह नहीं है कि औद्योगिक वृद्धि और ज्यादा से ज्यादा रोजगार सृजन महत्वपूर्ण किन्तु वर्तमान के लिए भविष्य को जोखिम में नहीं डाला जा सकता।

संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार, 2050 तक वैश्विक जनसंख्या 9 बिलियन से अधिक होने का अनुमान है। ऐसे प्राकृतिक संसाधनों और कच्चे माल पर पड़ने वाले दबावों की कल्पना कीजिए जिनका उपभोग उनके पुन: उत्पादन की दर की तुलना में ज्यादा तेजी से हो रहा है।

संयुक्त राष्ट्र ने सितम्बर, 2015 में "संपोषणीय विकास हेतु 2030 की कार्यसूची" अपनाई थी। इस सार्वभौमिक कार्यसूची में यह आधार तय किया गया है जिसे सभी देश राष्ट्रीय विकास संबंधी कार्यनीतियां तैयार करते समय आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय सरोकारों को ध्यान में रखें।

एस.डी.जी. के संदर्भ में, समावेशी एवं संपोषणीय औद्योगिकीकरण तथा एस.एम.ई. का विकास राष्ट्रीय सरकारों का विकास संबंधी प्राथमिक कार्यसूची होनी चाहिए जिससे आर्थिक वृद्धि, नौकरी सृजन, सामाजिक स्थायित्व और पर्यावरण की सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों को हल किया जा सके।

17 संपोषणीय विकास लक्ष्यों और 169 उद्देश्यों में से अनेक ऐसे लक्ष्य हैं जिससे एस.एम.ई. का विकास विशेषकर एस.डी.जी. 9 प्रभावित होता है जो तीन स्तम्भों-अवसंरचना, उद्योग और नवाचार पर टिका हुआ है, ये अब आपस में दृढ़ता से जुड़े हुए हैं और सामाजिक रूप से समावेशी एवं पर्यावरणीय रूप से संपोषणीय आर्थिक विकास से साझा लक्ष्य के हिस्से हैं।

यद्यपि, विगत दशक के दौरान, पूर्व और दक्षिण एशिया जैसे अंचलों में अवसंरचना, औद्योगिकीकरण और नवाचार के क्षेत्रों में विकास संबंधी लक्ष्यों की प्रा‍प्ति में उल्लेखनीय उन्नति की है, 2030 तक एस.डी.जी. 9 की प्राप्ति के लिए संसाधनों की कमी, विशेषकर विकासशील देशों, अल्पतम विकसित देशों, भूमिआबद्ध विकासशील देश (एलएलडीसी) और छोटे-छोटे विकासशील द्वीपीय राज्यों (एस.आई.डी.एस.) के संदर्भ में, को हल किए जाने की आवश्यकता है।

सभी देशों को अपनी-अपनी क्षमताओं को सुदृढ़ बनाना होगा और विकास से संबंधित चुनौतियों के समाधान हेतु सक्रियकों, प्रक्रियाओं एवं शासन के प्रकारों, वित्त स्रोत और सभी संबंधित्‍ पक्षों, क्षेत्रों और अंचलों के बीच सहभागिता एवं सहयोग को शामिल करके नए रास्ते खोजने होंगे।

विशेषकर एस.डी.जी. 9 को अपनाकर, वैश्विक समुदाय औद्योगिक विकास के प्रतिमान जो समावेशी और संपोषणीय है; के लिए प्रतिबद्ध हो गया है। जहाँ तक रोजगार सृजन, संपोषणीय आजीविका, एस.एम.ई. विकास, बेहतर स्वास्थ्य, प्रौद्योगिकी और कौशल विकास के साथ-साथ खाद्य सुरक्षा का संबंध है हरित प्रौद्योगिकियां, पर्यावरण सुरक्षा, नए बदलावों के अनुकूल शहरों का निर्माण तथा जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने जैसे अन्य सभी एस.डी.जी. के साथ संबंध स्थापित करना भी अनिवार्य है।

मुझे भरोसा है कि यह वैश्विक अभिसमय विभिन्न संबंधित पक्षों को नेटवर्क बनाने, अपने-अपने अनुभव साझा करने तथा इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण अच्छी प्रक्रियाओं को चिन्हांकित करने और उनके अनुकरण के लिए एक महत्वपूर्ण मंच के रूप में कार्य करेगा।

मैं विशेष रूप से यह महसूस करता हूँ कि भारत में आई.सी.एस.एम.ई. का आयोजन भारत और इसमें भाग लेने वाले अन्य देशों दोनों के लिए अत्यधिक गौरवपूर्ण है क्योंकि भारत ने "कारोबार करने की सुगमता" में 130 से 100वीं रैंक पर आकर उल्लेखनीय उन्नति की है। हम एस.एम.ई. क्षेत्र में उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए भी माहौल तैयार करने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।

एक बार पुन:, मैं इस असाधारण पहल तथा राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर एस.एम.ई. विकास का प्रणेता बनने के लिए डब्ल्यू.ए.एस.एम.ई. की सराहना करता हूँ।

मैं डब्ल्यू.ए.एस.एम.ई. तथा आई.सी.एस.एम.ई. की सम्पूर्ण सफलता की कामना करता हूँ तथा समग्र रूप से समावेशी, संसाधन-दक्ष और संपोषणीय विकास संबंधी कार्यनीति के अनुसरण के लिए विशिष्ट सिफारिशों की प्रतीक्षा करूँगा।

मैं आई.सी.एस.एम.ई. के लिए विभिन्न देशों से भारत आने वाले सभी सहभागियों को धन्यवाद अदा करता हूँ और आशा करता हूँ कि सम्मेलन के दौरान सभी लोग हमारी समृद्ध संस्कृति, विरासत, भोजन और आरामदेह प्रवास का आनंद उठाएंगे।

मेरी बातों पर ध्यान देने के लिए धन्यवाद।

जय हिन्द!"