30 अक्तूबर, 2018 को नई दिल्ली में राम विट्ठल शिक्षण सेवा समिति द्वारा स्थापित शोध संस्थान के उद्घाटन के अवसर पर भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

नई दिल्ली | अक्टूबर 30, 2018

“हमारी प्राचीन ज्ञान संपदा के संरक्षण और संवर्धन के लिये स्थापित किये जा रहे इस शोध संस्थान के उद्घाटन के शुभ अवसर पर आपके स्नेहिल आमंत्रण के लिये आप सभी का हृदय से आभारी हूँ।

मित्रों,

गतवर्ष देश के उपराष्ट्रपति के रूप में पदभार ग्रहण करने के बाद से, मेरा अनवरत प्रयास रहा है कि मैं शिक्षण संस्थाओं, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक शोध संस्थानों में जाकर वहाँ मेधावी युवाओं, उद्यमियों, वैज्ञानिकों, शोधकर्त्ताओं से मिलूँ, उनके साथ अनुभव और आशा-आकांक्षा साझा करूँ। ये अनुभव मेरे लिये अमूल्य रहे हैं। इनमें से प्रत्येक यात्रा एक तीर्थयात्रा के समान रही है। राष्ट्र के भविष्य के प्रति युवाओं की जीवंत आशा और हमारी गौरवशाली संस्कृति में उनकी अटूट आस्था ने मुझे प्रेरित किया है। आज इस अवसर पर पुन: मुझे, हमारी समृद्ध संस्कृति, ज्ञान परंपरा और युवा अपेक्षाओं की इस जीवनदायनी त्रिवेणी के दर्शन हो रहे हैं।

मित्रों,

मुझे राम विट्‌ठल शिक्षण सेवा समिति द्वारा शिक्षा और संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के लिये किये जा रहे प्रयासों की जानकारी मिली है।

आपने भारतीय दर्शन पर ग्रंथों की मूल पांडुलिपियों को संरक्षित करने का अभिनंदनीय प्रयास किया है।

इसके अतिरिक्त भारतीय दर्शन और ज्ञान परंपरा पर संस्कृत, कन्नड, हिंदी और अंग्रेंजी भाषाओं में आधिकारिक कोष तैयार किये हैं। संस्था ने भारतीय दर्शन, राजनीति और अर्थशास्त्र पर विद्वानों द्वारा कई व्याख्यान आयोजित किये हैं और कई शोधपरक प्रकाशन भी निकाले हैं।

आपके प्रयास हमारे प्राचीन ज्ञान के संरक्षण और संवर्धन में सार्थक हों और भावी शोधार्थियों के लिये सहायक हों। मेरी शुभकामना है।

शोध संस्थान में अपने पारंपरिक ज्ञान को संरक्षित करने के लिये आधुनिक तकनीक का प्रयोग किया जायेगा। प्रस्तावित शोध संस्थान वेद, वेदांग, दर्शन तथा अन्य प्राचीन ग्रंथों की मूल पांडुलिपियों को Digitise करेगा और उन्हें अन्य शोध संस्थानों को भी उपलब्ध करायेगा।

मुझे स्मरण है कि अटल जी ने भी पांडुलिपियों के Digitisation के लिये National Manuscript Mission प्रारंभ किया था। अगर संभव हो तो आप इस Mission का लाभ उठायें।

प्राचीन ज्ञान का संरक्षण और नये ज्ञान और तकनीकी के प्रति आग्रह ही किसी समाज को जीवंत बनाता है और उसकी ज्ञान परंपरा को प्रासंगिक बनाये रखता है।

मित्रों,

मुझे बड़ी प्रसन्नता है कि आपका शोध संस्थान हमारे प्राचीन ग्रंथों की मूलप्रतियों का संकलन करेगा, उन्हें Digitise करायेगा और उनपर शोध, अध्ययन को प्रोत्साहित करेगा। राष्ट्र का सांस्कृतिक-नवचेतना को जागृत करने में आपका सहयोग अभिनंदनीय है।

Friends,

Our intellectual heritage needs to be preserved and propagated. We must also add to our rich intellectual and cultural heritage. We must also draw lessons that are relevant for our current context.

Friends,

In the Indian tradition, Education is essentially about knowledge and wisdom. The vision of our seers was holistic and encompassed the development of head, hand and heart in equal measure.

As the famous saying of ancient India goes:

“Knowledge gives humility, humility leads to competence, competence brings wealth, With wealth you can achieve your goals and discharge your duties and when you do that you lead a fulfilled life.”

Knowledge liberates us from obscurantism and superstitions, gives us freedom to think and act and gives us courage to explore the new frontiers of knowledge. My distinguished predecessor Dr. S. Radhakrishanan used to say-‘The true teacher is one who helps us to see within ourselves.’ We can see what is the capability within us and realize it. In Thirukkural it is said –“Wisdom is a weapan against decay, it is an inner fortress that no enemy can destroy.” Our ancient texts are full of such enlightening precepts .We should use these timeless concepts and ideals to guide our future generations.

मित्रों,

गुरूओं के प्रति अपना ऋण हम समाज में अध्ययन, अध्यापन तथा विद्या दान से चुका सकते हैं। मैं अपेक्षा करता हूँ कि यह संस्थान, यहां के गुणी गुरूजन और शिक्षार्थी, इस संस्थान के लिये निर्धारित उद्‌देश्यों का निर्वहन करेंगे तथा स्वामी विश्वेशतीर्थ जी के प्रयासों को सार्थक बनायेंगे।

आपके भावी प्रयासों के लिये शुभकामनाएं देता हूँ।

धन्यवाद, जयहिंद।”