25 नवंबर, 2017 को नई दिल्ली में हरिजन सेवक संघ द्वारा आयोजित ऑल इंडिया गांधियन कान्सट्रक्टिव वर्कर्स कान्फ्रेंस में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति द्वारा दिया गया भाषण

नई दिल्ली | नवम्बर 25, 2017

मुझे दो दिन के लिए आयोजित की जा रही आल इण्डिया गांधियन कांस्ट्रक्टिव वर्कर्स कान्फ्रेंस तथा महात्मा गांधी योग केन्द्र का उद्घाटन करते हुए अति प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है।

वास्तव में, इस महान स्वयंसेवी संगठन के साथ जुड़ना मेरे लिए अत्यंत सम्मान की बात है जिसकी स्थापना स्वयं राष्ट्र पिता ने अस्पृश्यता के उन्मूलन तथा निर्धन और पददलितों के उत्थान के उद्देश्य से की थी। यह हमारे लिए गौरव का विषय है कि सन 1932 में स्थापित हरिजन सेवक संघ के संविधान, नियमों और विनियमों की रचना स्वयं गांधीजी ने की थी।

इसकी स्थापना से ही इस संगठन ने पददलितों के बीच शिक्षा का सवंर्धन करके तथा अस्पृश्यता जैसी सामाजिक बुराइयों के विरूद्ध लड़ाई लड़कर महत्वपूर्ण सेवाएं प्रदान की हैं। मित्रों, यह अत्यंत चिंता का विषय है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के 70 वर्ष बाद और सरकारों तथा आपके संगठन जैसे स्वैच्छिक निकायों के सुव्यवस्थित प्रयास के बावजूद हमें देश के विभिन्न भागों में यदा-कदा अस्पृश्ता जैसी बुरी प्रथाएं देखने को मिलती हैं। इन्हें स्वीकार नहीं किया जा सकता है और न ही सहन किया जा सकता है।

यह अत्यंत विरोधाभासी बात है कि जहां एक और भारत विश्व की तेजी से प्रगति कर रही अर्थव्यवस्था के रूप में आगे बढ़ रहा है वहीं दूसरी ओर जातिवाद, सम्प्रदायवाद और भ्रष्टाचार जैसी सामाजिक बुराइयां आज भी व्याप्त हैं और इनसे देश का सामाजिक ताना-बाना नकारात्मक रूप से प्रभावित हो रहा है। भारत के विकास पर बुरा प्रभाव डालने वाली इन तीन विनाशकारी बुराइयों का समूल नाश करना ही होगा। निजी विद्यालयों में निर्धन वर्ग के लिए 25 प्रतिशत सीटों की व्यवस्था जैसे सामाजिक समावेशन हेतु किए गए उपायों को कड़ाई से लागू किया जाना चाहिए।

मित्रों, आर्थिक विकास का लाभ समाज के हरेक वर्ग और विशेष रूप से निर्धनतम व्यक्ति तक पहुंचना चाहिए। जबकि सरकारें जरूरत मंदों और गरीबों के लिए कल्याणकारी योजनाएं जारी रखेंगी वहीं देश के प्रत्येक विवेकशील नागरिक को वंचितों के जीवन में बदलाव लाने के लिए हर संभव प्रयास करने चाहिए। जाति, धर्म अथवा सामाजिक पदानुक्रम के नाम पर लोगों के मनों में खड़ी की गई विभाजनकारी दीवारों को ध्वस्त करना होगा।

हमने जिस 'नए भारत' की परिकल्पना की है उसका निर्माण इस प्रकार होना चाहिए जो निर्धनता से मुक्त हो और जहां सबके पास एक समान धन और समृद्धि हो। इसे लिंग-आधारित पक्षपात, महिलाओं और कमजोर वर्गों पर होने वाले अत्याचारों, भ्रष्टाचार, धार्मिक अतिवाद, आतंकवाद और क्षेत्रवाद से मुक्त होना चाहिए। यह एक ऐसा राष्ट्र होना चाहिए जहां लोगों में दृढ़ आचारिक और नैतिक मूल्य विद्यमान हों और जो 'एक देश एक नागरिक' की धारणा में विश्वास रखते हों चाहे वो किसी भी धर्म से संबंधित हों।

भारत की जनसंख्या के लगभग 65 प्रतिशत लोग 35 वर्ष से कम आयुवर्ग के हैं जिससे भारत बड़े बदलाव के शिखरबिंदु पर है और देश के विकास के लिए शिक्षित युवाओं के कौशल और प्रतिभा का सदुपयोग किया जाना चाहिए। युवाओं को असंख्य अवसर मिलेंगे तथा उन्हें इन अवसरों का लाभ उठाते हुए उनका उपयोग अपने और साथ ही देश के उज्जवल भविष्य के लिए करना चाहिए।

विकास में तेजी लाने और भारत को निवेशकों के लिए एक आकर्षक वैश्विक निवेश स्थल बनाने के उद्देश्य से किए जा रहे आर्थिक सुधारों के अलावा, शासन में सुधार लाने और इसे जनता के प्रति ज्यादा जवाबदेह बनाने की दृष्टि से कुछ चुनाव सुधारों पर भी विचार किया जाना चाहिए।

वास्तव में यह सम्मेलन बिल्कुल सही समय पर आयोजित किया जा रहा है और मुझे यह जान कर खुशी हुई है कि यहां एकत्रित सभी लोग राष्ट्र निर्माण के कार्य में महती योगदान दे रहे हैं।

हरिजन सेवक संघ द्वारा चलाए जा रहे विद्यालय और छात्रावास, पारिवारिक परामर्श केन्द्र, धर्मार्थ चिकित्सालय तथा प्राकृतिक चिकित्सा जीवन केन्द्र जैसे विभिन्न कार्यक्रम उत्कृष्ट और सराहनीय प्रयास हैं। इन प्रयासों से पददलितों के उत्थान तथा उन्हें समाज की मुख्य धारा से जोड़ने में काफी मदद मिलेगी। वास्तव में, पूर्व राष्ट्रपति, श्री के. आर. नारायणन का यह वक्तव्य कि यदि हरिजन सेवक संघ द्वारा संचालित आश्रम स्कूल विद्यमान नहीं होता तो शायद वह स्कूली-शिक्षा से वंचित रह जाते, इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि यह महान सगठन कितना उत्कृष्ट माननीय कार्य कर रहा है।

अंत में, मैं विभिन्न समाज सेवियों, निगमित निकायों और उद्योगों से यह अपील करके अपनी बात समाप्त करुंगा कि वे हरिजन सेवक संघ को जरुरतमंदों और निर्धनों की सेवा हेतु अपने कार्यकलापों का विस्तार करने के लिए समर्थ बनाने हेतु उसे उदारतापूर्वक दान दें।

जय हिंद।