25 जून, 2018 को नई दिल्ली में 19वें वैकुंठ भाई मेहता स्मारक व्याख्यान में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु का संबोधन

नई दिल्ली | जून 25, 2018

"मुझे प्रसन्नता है कि मैं आज भारतीय राष्ट्रीय सहकारी संघ (एनसीयूआई) द्वारा आयोजित किए जा रहे इस वर्ष का वैकुंठ भाई मेहता स्मारक व्याख्यान देने हेतु आप सब के बीच यहां उपस्थित हूं।

इस अवसर पर, मुझे इस कार्यक्रम में मौजूद विभिन्न प्रतिष्ठित को-ऑपरेटरों और गणमान्य व्यक्तियों को देखकर प्रसन्नता हो रही है। एक सहकारी नेता, जो सहकारी समितियों के सिद्धांतों और मूल्यों के प्रति पूरी तरह से समर्पित थे, की याद में इस व्याख्यान को आयोजित करने के लिए एनसीयूआई की पहल का स्वागत करता हूं। सहकारी आंदोलन के विकास, विशेष रूप से शिक्षा और प्रशिक्षण में उनके अग्रणी योगदान को, सभी द्वारा स्वीकार किया जाता है। 1953 में उन्हें अखिल भारतीय खादी और ग्रामोद्योग बोर्ड का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था। वे बॉम्बे प्रोविंस बैंकिंग जांच समिति (1929), टेक्सटाइल लेबर जांच समिति (1939-40), टेक्सटाइल जांच आयोग (1953-54) के सदस्य थे और कृषि सहकारी ऋण आयोग (1959) के अध्यक्ष थे। महाराष्ट्र के वित्त मंत्री रहते हुए उनके द्वारा किए गए मूल्यवान योगदान के बारे में भी हम जानते हैं। एक समर्पित गांधीवादी, वैकुंठभाई राजनीति की तुलना में महात्मा गांधी की रचनात्मक गतिविधियों में अधिक रुचि रखते थे। उन्होंने गांधीजी और सरदार पटेल द्वारा व्यक्तिगत दबाव डाले जाने के बाद ही 1947 में वित्त मंत्री के पद को स्वीकार किया। वे रोजाना सूत कातते थे और केवल खादी पहनते थे। उनका एक शौक पढ़ना था और उन्होने अपना खुद का एक समृद्ध पुस्तकालय बनाया था। वे यथार्थ रूप में विनम्र व्यक्ति थे जो किसी भी तरह के प्रचार को नापसंद करते थे। उनका जीवन सहकारी आंदोलन और ग्रामोद्योग के क्षेत्र में राष्ट्र के प्रति चुपचाप से समर्पित सेवा करने का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है। मैं अपने महान देश के इस लब्धप्रतिष्ठ पुत्र के प्रति अपनी ओर से सम्मान व्यक्त करता हूं।

सहयोग की अवधारणा की अंतर्निहित शक्ति इसके सिद्धांतों और मूल्यों में है।

सिद्धांत और मूल्य किसी सहकारी संगठन को एक अद्वितीय चरित्र प्रदान करते हं जो किसी निजी उद्यम में नहीं मिलता है। वे न केवल सहकारी समिति को, उसके व्यवसाय को बनाए रखने में सहायता करते हैं, बल्कि जाति, पंथ या किसी अन्य भेद-भाव के बावजूद लोगों को एक साथ लाकर समाज में सामाजिक सद्भाव भी लाते हैं।

सहकारी समितियां सामाजिक-आर्थिक संगठन हैं जिनका अनिवार्य लोकाचार सामुदायिक सेवा है, और वे केवल लाभ से प्रेरित होकर नहीं चलायी जाती हैं। वे मुख्य रूप से समाज के गरीब वर्गों की सहायता के लिए हैं।

कृषि हमारी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है और हमारे देश की 55% से अधिक जनसंख्या की आजीविका कृषि और संबद्ध गतिविधियों पर निर्भर है।

वर्ल्ड को कोओपरेटिव मॉनीटर' के संबंध में अंतरराष्ट्रीय सहकारी गठबंधन द्वारा प्रकाशित हाल के आंकड़ों के मुताबिक दुनिया के 300 सबसे बड़ी सहकारी समितियों में से लगभग 30% कृषि और खाद्य उद्योग क्षेत्र में हैं।

दुनिया भर में कृषि सहकारी समितियों ने छोटे किसानों को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और यह बात ध्यान देने योग्य है कि ये छोटे किसान विश्व खाद्य उत्पादन के 80% के लिए जिम्मेदार हैं।

2022 तक किसानों की आमदनी को दोगुना करने के लिए सरकार के सात सूत्री एजेंडे की रणनीति को ध्यान में रखते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि कृषि सहकारी समितियां उर्वरक के संतुलित उपयोग के माध्यम से कृषि की लागत को कम करने, जल उपयोग दक्षता मंव सुधार करने के लिए किसानों को शिक्षित करने, फसलों को मजबूरन बिक्री से बचाने के लिए और अधिक गोदाम स्थापित करने, राष्ट्रीय ई-मार्केट (ई-एनएएम) के साथ जुडने, मूल्य संवर्धन पर जोर देने और किसानों को मुर्गीपालन, मधुमक्खी पालन, मत्स्य पालन जैसी अन्य संबद्ध गतिविधियों को अपनाने लेने के लिए प्रोत्साहित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

हाल के वर्षों में अर्थव्यवस्था के वैश्वीकरण के पश्चात सहकारी आंदोलन कई समस्याओं का सामना कर रहा है। भारतीय सहकारी आंदोलन जो दुनिया का सबसे बड़ा आंदोलन है, की अपनी अंतर्निहित शक्ति और कमजोरी है। 8 लाख से अधिक सहकारी समितियों के साथ, सामाजिक-आर्थिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में सहकारी समितियों की महत्वपूर्ण उपस्थिति है।

डेरी सहकारी समितियों ने देश में दुग्ध क्रांति की शुरुआत की है। अमूल घर-घर का जाना पहचाना नाम बन गया है। इफको, कृभको, अमूल इत्यादि जैसे बड़े संस्थान सहकारी क्षेत्र में सफलता की बड़ी कहानियां हैं। इसके अलावा राज्य स्तर पर शहरी सहकारी बैंकों, प्राथमिक कृषि सहकारी समितियों, आवास, मत्स्यपालन और अन्य प्रकार की सहकारी समितियों जैसी सहकारी समितियां बड़ी संख्या में हैं जो ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए अथक प्रयास कर रही हैं।

जमीनी स्तर पर शहरी-ग्रामीण अंतर को पाटने में और आय उपार्जन के अवसर पैदा करने में सहकारी क्षेत्र के प्रभाव की एक बड़ी भूमिका है।

बहनों और भाइयों,

मैं एक छोटे से गांव के एक किसान का बेटा हूँ। कृषि की मजबूत पृष्ठभूमि होने के कारण मैं किसानों की समस्याओं से अवगत हूं। यह दुख की बात है कि बड़ी संख्या में कृषि सहकारी समितियों की मौजूदगी के बावजूद किसान अभी भी महाजनों की दया पर हैं। हमें सहकारी समितियों को मजबूत बनाने की जरूरत है ताकि वे किसानों के कल्याण के लिए काम कर सकें और उचित ब्याज दर पर उन्हें ऋण दे सकें।

मुझे खुशी है कि वर्तमान सरकार सहकारी आंदोलन को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है। हमारे पास नेफेड का एक उदाहरण है जहां सरकार ने 40000 करोड़ रुपये की गारंटी दी है।

सहकारी समितियों को अपने अस्तित्व को निरंतर बनाए रखने के लिए और सदस्यों की बेहतर सेवा करने के लिए, मधुमक्खी उत्पादन, समुद्री शैवाल खेती इत्यादि जैसे नए क्षेत्रों में अपने परिचालन का विस्तार करना होगा। सहकारी समितियों को किसानों को उर्वरकों का सही उपयोग करने के लिए प्रशिक्षित करना चाहिए और कृषि से संबंधित नई प्रौद्योगिकियों में भी उन्हें प्रशिक्षित करना चाहिए ।

सहकारी समितियों ने ग्रामीण इलाकों में अपने व्यापक नेटवर्क के माध्यम से किसी भी अन्य संस्थान की तुलना में किसानों का अधिक विश्वास जीता है। जन धन योजना, प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना, प्रधान मंत्री कृषि सिंचाई योजना, मुद्रा योजना जैसी सरकार की विभिन्न योजनाएं सहकारी समितियों के लिए सरकार के साथ सहयोग करने और कई लाभों को प्राप्त करने का एक अच्छा अवसर प्रदान करती हैं। सहकारी क्षेत्र के पास देश भर में फैली विशाल पेशेवर जनशक्ति है, अपनी स्वयं की विशाल अवसंरचना है और ग्रामीण इलाकों में इसकी मजबूत सामुदायिक जड़ें हैं। मुझे लगता है कि आने वाले समय में सहकारी समितियों को सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के साथ पारस्परिक सहक्रिया तलाशने की आवश्यकता है ताकि संसाधन निर्माण के नए रास्ते तलाशे जा सकें। वर्तमान में हम केवल सार्वजनिक-निजी भागीदारी के बारे में बात करते हैं। इसके साथ तीसरे तत्व के रूप में सहकारी समितियों को शामिल करना चाहिए ताकि हमारे पास सार्वजनिक-निजी-सहकारी भागीदारी हो जो गांवों में कृषक समुदाय के लिए व्यापक प्रासंगिकता वाले विकास का एक नया मॉडल प्रदान कर सके।

मुझे बेरोजगारी, विशेष रूप से उन ग्रामीण इलाकों में जहां निर्धन लोगों में कौशल की कमी है, की समस्या को हल करने में सहकारी समितियों के लिए जबरदस्त अवसर दिखता है। इसलिए, सहकारी समितियों के माध्यम से ग्रामीण आबादी को कौशल प्रदान करना एक बड़ा भावी कदम हो सकता है। यह मौजूदा सरकार के कौशल विकास पर बल दिये जाने के अनुरूप है। एनसीयूआई, एनसीडीसी, इफको आदि जैसी सहकारी समितियों की ग्रामीण क्षेत्रों में परियोजनाएं और कार्यक्रम हैं। इसलिए इन कार्यक्रमों में कौशल निर्माण पर ध्यान केंद्रित किए जाने से न केवल ग्रामीण युवाओं को रोजगार प्राप्त करने के लिए तैयार किया जा सकता है, बल्कि उन्हें अच्छे उद्यमी बनने के अवसर भी प्रदान किए जा सकते हैं।

भारत ने विभिन्न राज्यों में 100 स्मार्ट शहरों की स्थापना का लक्ष्य निर्धारित किया है। इस कार्य को पूरा करने के लिए श्रम और अनुबंध सहकारी समितियों जैसे उर्लुंगल लेबर कॉन्ट्रैक्ट एंड कंस्ट्रक्शन सोसाइटी की सेवाएं आधुनिक और उच्च तकनीकी अवसंरचना के विकास में लगाने की आवश्यकता है और संगठित श्रम सहकारी समितियों के ऐसे मॉडल अन्य प्रस्तावित शहरों में दोहराए जा सकते हैं।

जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, सहकारी शिक्षा और प्रशिक्षण में वैकुंठ भाई मेहता का योगदान महत्वपूर्ण था। यह वर्तमान समय में बहुत प्रासंगिक है जब सहकारी समितियों को प्रभावी प्रशिक्षण के माध्यम से अपने कामकाज को पेशेवर बनाने की आवश्यकता है।

सहकारी प्रशिक्षण न केवल सहकारी समितियों के कर्मचारियों बल्कि सहकारी समितियों के बाहर स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों, तकनीकी और पेशेवर संस्थानों के छात्राओं के लिए, और उन लोगों के लिए भी जो सहकारी समितियों का गठन करना चाहते हैं, किंतु जो विभिन्न तौर-तरीकों तथा अपेक्षाओं से अवगत नहीं हैं, को भी प्रदान किया जाना चाहिए।

चूंकि "सहकारिता" राज्य का विषय है और सहकारी समितियां सहभागिता और जन-आधारित संगठन हैं, इसलिए राज्यों द्वारा सहकारी आंदोलन को मजबूत किए जाने की आवश्यकता है।

आज, डिजिटल प्रौद्योगिकी प्रशासन, बैंकिंग और व्यवसायों में परिवर्तन ला रही है। सहकारी समितियों को अपने कामकाज में प्रौद्योगिकी की शक्ति का पूरी तरह से उपयोग करना चाहिए।

मुझे खुशी है कि भारत सरकार ने 63000 से अधिक प्राथमिक कृषि सहकारी समितियों (पीएसीएस) को कम्प्यूटरीकृत करने के लिए पर्याप्त बजटीय सहायता दी है। पीएसीएस ग्रामीण इलाकों में किसानों की सेवा करने वाली सर्वाधिक महत्वपूर्ण सहकारी समितियां हैं। इसलिए उपयुक्त तकनीक के उपयोग के द्वारा पीएसीएस को मजबूत करना वास्तव में समय की मांग है।

यह उचित समय है कि सभी स्तरों पर सहकारी समितियां पेशेवर तरीके से भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार हो जाएँ।

एक समृद्ध सहकारी संस्कृति और एक जीवंत सहकारी आंदोलन वाला भारत केवल तभी आगे बढ़ सकता है जब हमारे पास एक मजबूत नेतृत्व हो जो सहकारी आंदोलन के विकास के लिए एक नई दिशा प्रदान कर सके। आईसीए ब्लू-प्रिंट ऑफ कोओपरेटिव डिकेड इस बात पर बल देता है कि सहकारी समितियां 2020 तक लोगों के विकास के सबसे पसंदीदा मॉडल के रूप में उभरकर सामने आएंगी। इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए सहकारी नेतृत्व में आज दृष्टि, समर्पण और प्रतिबद्धता तथा पारदर्शिता होनी चाहिए। सहकारी आंदोलन के महान व उदात्त आदर्शों का यह समावेशन स्व. वैकुंठ भाई मेहता को सच्चे अर्थों में श्रद्धांजलि होगी।

हमारे लोगों के कल्याण के लिए सहकारी आंदोलन को मजबूत करने के आपके प्रयास के लिए मैं आप सभी को शुभकामनाएं देता हूं।

जय हिन्द!"