23 मार्च, 2018 को मुंबई में मिन्ट कॉरपोरेट कार्यनीति पुरस्कार प्रदान करने के उपरांत सभा में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

मुम्बई | मार्च 23, 2018

"मिन्ट कॉरपोरेट कार्यनीति पुरस्कार प्रदान करने के लिए आपके बीच आकर मुझे प्रसन्नता हो रही है। मैं सम्मानित निर्णायकगण द्वारा चयनित विजेताओं को बधाई देता हूं।

यह जानकर अच्छा लग रहा है कि अर्थव्यवस्था के विकास के वृहत्तर लक्ष्य को लेकर कॉरपोरेट और मीडिया एक साथ आ रहे हैं।

मुझे यह जानकर प्रसन्नता है कि इस शाम के मिन्ट कॉरपोरेट कार्यनीति पुरस्कार-2018 चार श्रेणियों नामत:- शास्त्रीय, अनकूलक, स्वरूप प्रदान करने वाले और नवीकरण में सर्वाधिक योग्य विजेता कंपनियों की पहचान करने के लिए एक विस्तृत प्रविधि पर आधारित एक वर्ष की तैयारी के परिणाम हैं। कॉरपोरेट शासन के मुद्दे पर अपने विचारों को साझा करने के पूर्व मैं पूरे हृदय से इन पुरस्कारों के विजेताओं और साथ ही अपनी प्रशंसनीय पहल के लिए मिन्ट की भी सराहना करता हूं।

उदारीकरण और विभिन्न सुधारों के बाद भारत में कॉरपोरेट क्षेत्र और निजी क्षेत्र की भूमिका में महत्वपूर्ण विस्तार हुआ है। निजी क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास में अत्याधिक योगदान दे रहा है। भारतीय अर्थव्यवस्था सर्वाधिक तेज गति से आगे बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बन गयी है और 2018-19 में 7.3 प्रतिशत की सकल घरेलू उत्पाद विकास दर प्राप्त करने के लिए भलीभांति संतुलित है।

इस बात पर ध्यान देते हुए कि विमुद्रीकरण और माल सेवा कर के कार्यान्वयन से संबंधित अवरोध के कारण क्रमश: 2016-17 की अंतिम दो तिमाहियों और 2017-18 की प्रथम तिमाही में अर्थव्यवस्था में 'अस्थायी गिरावट' आयी विश्व बैंक ने कहा कि गत वर्ष अगस्त से आर्थिक गतिविधि स्थिर होने लगी और इस वर्ष 6.7 प्रतिशत की विकास दर रहने की संभावना है।

भारत की समष्टि अर्थव्यवस्था के आधार बहुत मजबूत हैं, देश प्रत्यक्ष विदेशी निवेश विश्वास सूचकांक में बाजार के शीर्ष दो उभरते हुए निष्पादकों में से एक है। अंकटाड ने भी भारत का आकलन विश्व के प्रिय प्रत्यक्ष विदेशी निवेश लक्ष्यों में से एक के रूप में किया है।

चूंकि भारत विदेशी निवेश के आकर्षक गंतव्य में परिणत हो रहा है और सरकार 'मेक इन इंडिया' कार्यक्रम के माध्यम से विनिर्माण क्षेत्र को बढ़ावा दे रही है, ऐसा माना जाता है कि 2025 तक इस क्षेत्र के एक ट्रिलियन यूएस डॉलर तक पहुंचने की संभावना है।

चूंकि वैश्विक अर्थव्यवस्था आगे बढ़ रही है, भारत को विकास दर को और अधिक बढ़ाने के लिए वैश्विक स्थिति का लाभ उठाना चाहिए।

चूंकि ग्रामीण परिवारों का 58 प्रतिशत कृषि पर निर्भर है, अत: सरकार ने 2022 तक किसानों की आय को दोगुना करने के उद्देश्य से कई पहल की है। शहरी-ग्रामीण अंतर को पाटना बहुत बड़ी चुनौतियों में से एक है और मैं महसूस करता हूं कि कॉरपोरेट क्षेत्र को विशेषकर शिक्षा, स्वास्थ्य और कौशल विकास क्षेत्रों में इस अंतर को समाप्त करने में वृहत्तर भूमिका निभानी चाहिए।

यद्यपि उदारीकरण, डिजिटल क्रांति और जल्द मंजूरी देने में और व्यापार करने में सहूलियत देने जैसे सुधारों का उद्देश्य लाल फीताशाही को कम करना है और कॉरपोरेट क्षेत्र के विकास को बढ़ावा देना है, विडम्बना यह है कि कुछ अनैतिक व्यक्ति और कंपनियां व्यवस्था का दुरुपयोग करने और धोखाधड़ी के कार्यों में संलिप्त होने की कोशिश कर रहे हैं। निस्संदेह कुछ बेईमान अधिकारी भी सांठ-गांठ कर ऐसे अनैतिक व्यवहारों में शामिल हो जाते हैं।

कॉरपोरेट शासन आर्थिक क्षमता और विकास में सुधार लाने तथा निवेशक के आत्मविश्वास को बढ़ाने में एक महत्वपूर्ण अवयव है। कॉरपोरेट प्रशासन में कंपनी के प्रबंधन, इसके बोर्ड, इसके हितार्थी और अन्य हितार्थियों के बीच संबंध शामिल हैं। उत्तम कॉरपोरेट शासन को अर्थव्यवस्था और इसके हितार्थियों के हित में उद्देश्यों को पूरा करने के लिए बोर्ड और प्रबंधन को समुचित प्रोत्साहन देना चाहिए और प्रभावी निगरानी को सुगम बनाना चाहिए। किसी कंपनी के भीतर और पूरी अर्थव्यवस्था में प्रभावी कॉरपोरेट शासन प्रणाली आत्मविश्वास प्रदान करने में मदद करता है जो विपणन अर्थव्यवस्था के समुचित कार्यकरण के लिए आवश्यक है।

कॉरपोरेट शासन वृहत्तर आर्थिक परिप्रेक्ष्य का हिस्सा मात्र है जिसमें फर्म कार्य करते हैं जिनमें समष्टि अर्थशास्त्र की नीतियां, उत्पादन और बाजार में प्रतिस्पर्द्धा की मात्रा शामिल है। यह विधिक, विनियामक और संस्थागत पर्यावरण पर भी निर्भर है। इसके अतिरिक्त, व्यवसाय संबंधी नीति और ऐसे समुदाय जिनमें कोई कंपनी कार्य करती है, के पर्यावरणीय और सामाजिक हित संबंधी कॉरपोरेट जागरूकता जैसे घटकों का प्रभाव भी इसके विनियमन और इसकी दीर्घकालिक सफलता पर पड़ सकता है।

प्राचीन मौर्य साम्राज्य के कौटिल्य से लेकर आधुनिक कारपोरेट साम्राज्य तक शासन के मुद्दों ने हमेशा शासकों और अन्य हितार्थियों का ध्यान आकर्षित किया है। कौटिल्य मानते थे कि राजा की प्रसन्नता लोगों की प्रसन्नता पर निर्भर करती है। उन्होंने यह प्रतिपादित किया कि राजा और उसके मंत्रियों को कठोर अनुशासन का पालन करना चाहिए और हमेशा अपनी प्रजा के सर्वोत्तम हित में कार्य करना चाहिए। वर्तमान कॉरपोरेट संसार में हम जानते हैं कि राजा कौन है, मंत्री कौन हैं और अंतत: प्रजा कौन है। कौटिल्य की तुलना से यह निष्कर्ष निकलता है कि उन सभी को कतिपय अनुशासन का पालन करना चाहिए और हितार्थियों के हितों द्वारा प्रेरित होना चाहिए।

स्वतंत्रता के समय भारत में एक क्रियात्मक बाजार था, एक सक्रिय विनिर्माण क्षेत्र था और कई सुविकसित ब्रिटिश उद्भूत कॉरपोरेट प्रक्रियाएं थीं। 1947 से 91 तक हमने राज्य को निजी उपक्रमों के लिए ऋण और इक्विटी पूंजी के प्राथमिक प्रदाता बनाने हेतु बैंकों के राष्ट्रीयकरण जैसे समाजवादी औद्योगिक और वाणिज्यिक नीतियों का अनुरक्षण किया। 1991 के सामान्य आर्थिक उदारीकरण के बाद कॉरपोरेट शासन मानकों पर बल दिया जाने लगा। यह मुख्य रूप से कंपनियों को पूंजी की बढ़ती आवश्यकता और सेबी के निर्माण से उत्प्रेरित हुआ।

यद्यपि कॉरपोरेट शासन मानक कंपनी के समुचित कार्यकरण के लिए अत्यावश्यक हैं, इसे नीति कार्यसूची में सबसे प्रमुख स्थान देने में हमें बहुत समय लगा। भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) के डिजायरेबल कॉरपोरेट गवर्नेंस : ए कोड इन 1998 के साथ पहली बार आने के बाद ये कॉरपोरेट शासन मानक विकसित होते रहे। इसके बाद, बिड़ला समिति, नरेश चन्द्र समिति, नारायणमूर्ति समिति, डा. जे.जे. ईरानी समिति आदि ने कई अनुशंसाएं की जिसके फलस्वरूप कॉरपोरेट शासन के मानक वर्तमान रूप में विकसित हुए। बिड़ला समिति की अनुशंसाओं के आधार पर सेबी द्वारा स्टॉक एक्सचेंजों के लिस्टिंग अनुबंध के खंड 49 को शामिल करना कॉरपोरेट शासन में ऐतिहासिक सुधार माना जाता है। कंपनी अधिनियम, 2013 का अस्तित्व में आना शेयरधारकों, निदेशक मंडलों और प्रबंधन के संबंध निर्धारित करने वाले कॉरपोरेट शासन मानकों के विकास की इस प्रक्रिया में सबसे अद्यतन है।

हाल में भारत में कॉरपोरेट शासन सकारात्मक कारणों के बजाए नकारात्मक कारणों से अधिक खबरों में रहा हैं। मेरी दृष्टि में ऐसी घटनाएं एक प्रकार का ऐसा मंथन है जिससे सभी हितार्थियों को हमारे कॉरपोरेट शासन को विश्व में सर्वश्रेष्ठ कॉरपोरेट शासन के समान बनाने के लिए सही सबक लेने की आवश्यकता है। यह समय की मांग है जबकि हम एक राष्ट्र के रूप में इसकी स्वीकृत क्षमता को ध्यान में रखते हुए अपनी आर्थिक शक्ति का सर्वाधिक उपयोग करने के लिए उत्सुक हैं।

निवेश संबंधी निर्णयों के लिए निगमों (कॉरपोरेशन) के उत्तम कॉरपोरेट शासन के मूल सिद्धांतों से जुड़े रहने के परिणाम का एक घटक के रूप में महत्व बढ़ता जा रहा है। कॉरपोरेट शासन प्रक्रियाओं और निवेश के तेजी से आकार लेते अन्तर्राष्ट्रीय स्वरूप के बीच संबंध विशेष रूप से प्रासंगिक है। पूंजी के अन्तर्राष्ट्रीय प्रवाह कंपनियों को निवेशकों के वृहत्तर समूह से वित्त प्राप्त करने में सक्षम बनाते हैं। यदि देशों को वैश्विक पूंजी बाजार का पूरा लाभ प्राप्त करना है, और यदि उन्हें दीर्घकालिक पूंजी को आकर्षित करना है, तो कॉरपोरेट शासन व्यवस्थाओं को विश्वसनीय, दूसरे देशों के लिए सुबोध्य होना चाहिए और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत सिद्धांतों का पालन करना चाहिए। भले ही निगम मुख्यत: पूंजी के विदेशी स्रोत पर विश्वास न करें, उत्तम कारपोरेट शासन की प्रक्रियाओं को बनाये रखने से घरेलू निवेशकों के आत्म विश्वास को बढ़ाने, पूंजी की लागत घटाने, वित्तीय बाजारों को सुचारु रूप से संचालित करने और अन्तत: वित्त के अधिक स्थायी स्रोत पैदा करने में मदद मिलती है।

कारपोरेट शासन सूचीबद्ध कंपनियों से अधिक जुड़े हैं क्योंकि उन कंपनियों में ऐसे अनेक हितार्थी हैं जो कि सभी दैनंदिन प्रबंधन का हिस्सा नहीं हो सकते हैं। हितार्थी, निदेशक मंडल और प्रबंधन कॉरपोरेट प्रशासन के महत्वपूर्ण अंग हैं। कॉरपोरेट प्रशासन के तीन महत्वपूर्ण पहलू जवाबदेही, पारदर्शिता और सभी हितार्थियों के साथ समान व्यवहार है।

कॉरपोरेट शासन एक अर्थ में पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में वृहत्तर आर्थिक, विधिक और विनियामक पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा है। ये दो पारिस्थितिकी तंत्र एक-दूसरे का पोषण करते हैं जो परिणामस्वरूप संसाधन उपयोग की क्षमता और उत्पादन को प्रभावित करते हैं।

सेबी ने कॉरपोरेट शासन को 'निगम के सच्चे मालिक और शेयरधारकों की ओर से न्यासी के रूप में उनकी अपनी भूमिका संबंधी शेयरधारकों के अविच्छेद्य अधिकारों की प्रबंधन द्वारा स्वीकृति के रूप में परिभाषित किया। यह मूल्यों के प्रति समर्पण, व्यवसाय संबंधी नैतिक आचार और कंपनी के प्रबंधन में वैयक्तिक और कॉरपोरेट निधियों के बीच अंतर करने से संबंधित है।'

मेरे विचार से इस परिभाषा पर गांधीजी के न्यास सिद्धांत और भारतीय संविधान के नीति निर्देशक सिद्धांतों की छाप है। हमारे देश में कॉरपोरेट शासन के मानकों में सुधार लाने के लिए बीस वर्षों से अधिक के समेकित प्रयासों के बावजूद कई निगम इन मानकों का दूर-दूर तक पालन नहीं कर रहे हैं। जैसा कि हमने हाल में देखा कुछ सर्वाधिक स्थापित और प्रख्यात कंपनियां भी प्रबंधन और निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में कुछ दोषों के कारण जो सार्वजनिक हो चुके हैं, जांच के अधीन हैं। मुझे आपको दिया दिखाने की आवश्यकता नहीं है चूंकि आप हमारे कॉरपोरेट क्षेत्र के कार्यकरण से जुड़े दक्ष व्यक्ति हैं। तथापि, मैं कुछ उन मुद्दों का उल्लेख करना चाहूंगा जैसा कि मैं उन्हें समझता हूं।

अंतर्राष्ट्रीय मौद्रिक कोष के वैश्विक वित्तीय स्थिरता प्रतिवदेन के अनुसार हमारे देश में कॉरपोरेट शासन मानकों में 2006 और 2014 के बीच गिरावट आई। आपलोग मुझसे बेहतर जानते हैं कि यह गिरावट सुधार में परिणत हुई है अथवा नहीं परंतु सामान्य धारणा यही है कि कॉरपोरेट जगत में हाल की कुछ घटनाओं को ध्यान में रखते हुए हमारी कॉरपोरेट शासन व्यवस्था और प्रक्रिया में सुधार की आवश्यकता है।

भारत के विशिष्ट कॉरपोरेट शासन के मुद्दे परिवार के स्वत्वाधिकार वाली कंपनियों की उच्च प्रतिशतता से उद्भूत हैं। हमारे देश में एक तिहाई से अधिक कंपनियों का नियंत्रण एक अथवा एक से अधिक परिवार के सदस्यों के द्वारा एक दूसरे के सहयोग से किया जाता है। अधिकांश पारिवारिक व्यापार घराने यह नहीं देख पाते हैं कि व्यवसाय और परिवार के व्यक्तिगत मामलों में अंतर है। इस प्रकार, अक्सर परिवार के हित में निर्णय लिए जाते हैं और आवश्यक रूप से कंपनी के सर्वोत्तम हित में निर्णय नहीं लिए जाते हैं। यह एक महत्वपूर्ण कॉरपोरेट शासन समस्या है जिसका इस तरीके से समाधान किया जाना चाहिए कि परिवार की निधियों और कॉरपोरेट निधियों को एक ही न समझा जाए जैसा कि हाल ही में कुछ मामलों में देखा गया है।

हमारे परिदृश्य में, खुदरा निवेशक कंपनी के मामलों को प्रभावित करने में सक्रिय सहभागी होने के बजाए अपनी शेयरधारिता पर वास्तविक वित्तीय लाभ के बारे में अधिक चिंतित रहते हैं। बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक शेयरधारकों की भी समस्या है। बहुसंख्यक शेयरधारक कंपनियों को नियंत्रित करते हैं अल्पसंख्यक शेयरधारकों के हितों और चिंताओं से हमेशा प्रेरित नहीं होते हैं। बोर्ड के निदेशकों को नामनिर्देशित करने या नियुक्त करने तथा उन्हें हटाने में भी संस्थापक शेयर धारकों का प्रभुत्व हमारे देश में कमजोर बोर्ड का कारण बताया जाता है। जबकि खंड 49 के अंतर्गत सूचीबद्ध करना एक महत्वपूर्ण शासन सुधार कहा जाता है, परंतु एक सामान्य संकल्प द्वारा स्वतंत्र निदेशकों को आसानी से पदच्युत कर देना इस उपबंध के लक्ष्यों को कमजोर बना रहा है। अन्य कॉरपोरेट शासन समस्याओं जिनका समाधान किए जाने की आवश्यकता है, में प्रभावी उत्तराधिकार योजना, क्रॉसहोल्डिंग के निहितार्थ जोखिम प्रबंधन कार्य नीतियां सुनिश्चित करना और निदेशक मंडल का कंपनी के रूप में अपने कर्तव्य का निर्वहन करने के बजाय शेयर धारकों के अभिकर्ताओं के रूप में कार्य करना शामिल है।

मैं समझता हूं कि भारत के कॉरपोरेट शासन मानक और कानून व्यापक रूप से एंग्लोसैक्शन मॉडल पर आधारित हैं और संयुक्त राज्य अमेरिका के सार्बेन्स ऑक्सले अधिनियम के अनुसार हैं, यद्यपि क्रियात्मक संदर्भ एक-दूसरे से काफी भिन्न हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका में शेयर धारिता का प्रारूप बिखरा हुआ है जबकि भारत में यह कुछ हाथों में केंद्रित हैं। सौभाग्यवश, भारत में हाल के कुछ विवादों को बहुत तेजी से निपटा दिया गया है और इनसे कोई गंभीर नुकसान नहीं हुआ है परंतु हमें इंडिया इंक के सफल होने के लिए सही सबक लेने की आवश्यकता है।

जैसाकि मैने पहले कहा कॉरपोरेट क्षेत्र वृहत्तर सामाजिक आर्थिक पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा है। जब आप अधिक व्यापक व्यवस्था से उद्भूत होते हैं और सहारा प्राप्त करते हैं, तो आपसे अधिक व्यापक अंग की सेवा करने और उसके हितों को आगे बढ़ाने की उम्मीद की जाती है। सूचीबद्ध कंपनियां व्यापक संख्या में शेयरधारकों की व्यापक आशा और विश्वास पर सफल होती हैं। सभी शेयरधारकों के साथ उचित व्यवहार और बिना किसी भेदभाव के समानता का व्यवहार किए जाने की आवश्यकता है। समाज की भलाई सुविधाप्राप्त कुछेक लोगों के लाभ की चिंताओं के बजाए व्यापक संख्या में लोगों की भलाई के लिए धन के सृजन पर निर्भर करती है।

उच्चतर कॉरपोरेट शासन मानकों को वृहत्तर आचार और पर्यावरण संबंधी चिंताओं द्वारा निर्धारित किए जाने की आवश्यकता है। जलवायु परिवर्तन एक प्रमुख चिंता के रूप में उभरा है जिसे हम दरकिनार नहीं कर सकते। निवेश संबंधी प्रत्येक निर्णय कुछ प्रक्रियाओं को जन्म देता है जिसका जलवायु पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। अत: कॉरपोरेट के निर्णयों की पर्यावरणीय लेखापरीक्षा अनिवार्य है।

हमारे देश में कॉरपोरेट शासन समेत शासन के सभी मामलों में पारदर्शिता और जवाबदेही को विश्वसनीयता सुनिश्चित करने तथा शेयरधारकों समेत सभी हितार्थियों के आत्मविश्वास को बढ़ाने के लिए शीर्ष प्राथमिकता दिए जाने की आवश्यकता है। यह निदेशक मंडलों के गठन, निदेशकों के कार्य निष्पादन के मूल्यांकन, निदेशकों की स्वतंत्रता सुनिश्चित किए जाने, अधिशासियों के लिए क्षतिपूर्ति, उत्तराधिकार योजना, बाह्य लेखा परीक्षकों की नियुक्ति और चक्रण, सूचना प्रदाता प्रणाली लागू करना आदि जो प्रभावी कारपोरेट शासन के लिए महत्वपूर्ण हैं, पर अधिक लागू होते हैं।

कॉरपोरेट सामाजिक दायित्व (सीएसआर) एक प्रशंसनीय पहल है जो भारत मात्र कुछ अन्य देशों के साथ गर्वपूर्वक साझा करता है। यह वृहत्तर समाज के प्रति निगमों के उत्तरदायित्व को रेखांकित करता है और इसे प्रभावी रूप से अमलीजामा पहनाये जाने की आवश्यकता है।

भारत आगे बढ़ रहा है। नये भारत का सपना यथाशीघ्र साकार करने के लिए कॉरपोरेट क्षेत्र को उत्प्रेरक के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी है। इसके लिए गत्यात्मक, नवोन्मेषी, विश्वसनीय, पारदर्शी, जवाबदेह, मूल्य आधारित और प्रबुद्ध कॉरपोरेट शासन प्रक्रियाओं की आवश्यकता है। हमारे यहां वैश्विक मौजूदगी वाले अधिक निगम नहीं हैं। हमारी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के आकार और क्षमता को देखते हुए वैश्विक मौजूदगी वाली बहुत अधिक भारतीय कंपनियों के होने का कोई औचित्य नहीं है। आपको सुधार करने, कार्य करने और परिवर्तन करने की आवश्यकता है ताकि भारतीय कारपोरेट वैश्विक अवसरों के नये रास्ते खोल सके जिसके फलस्वरूप हमारे देश और देश के लोगों का भला होगा।

साथियों, अन्त में उच्चतर कारपोरेट शासन को अपने ढंग से आगे बढ़ाने हेतु मैं एक मधुर दर्शन का सुझाव देता हूं। इसका तात्पर्य है:

स्वामित्व और नियंत्रण का पृथक्करण,
धन सृजन जिसके लाभ सहोत्पाद होंगे,
निर्णय लेने और संसाधनों के उपयोग की क्षमता;
आचार और पर्यावरण संबंधी प्रतिबद्धताएं,
जवाबदेही के माध्यम से पारदर्शिता।

अंत में, मैं पुन: मिन्ट कारपोरेट कार्यनीति पुरस्कार 2018 के विजेताओं और मिन्ट को भी इस पहल के लिए तथा नवोन्मेष और उपक्रम के मार्ग पर कंपनियों को चलने के लिए प्रेरित करने हेतु उनके उद्यमी प्रयासों के लिए बधाई देता हूं।

धैर्यपूर्वक सुनने के लिए धन्यवाद।

जय हिन्द!"