23 नवंबर, 2017 को चेन्नई में एस आर एम विश्वविद्यालय के विशेष दीक्षांत समारोह, 2017 में माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु का अभिभाषण

चेन्नई | नवम्बर 23, 2017

मैं उन सभी छात्रों को बधाई देता हूँ जो आज अपनी डिग्री प्राप्त कर रहे हैं क्योंकि वे अवसरों तथा चुनौतियों की एक नई दुनिया में प्रवेश करने जा रहे हैं।

भारत में उच्च शिक्षा का विज़न देश के मानव संसाधन की क्षमता का समान एवं समावेशी रूप से विकास करना है। इसका मुख्य अभिप्राय सभी वर्गों, विशेषकर समाज के कमजोर वर्गों तक उच्च शिक्षा की अधिकाधिक पहुँच सुनिश्चित करना है।

मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने अपनी ओर से समावेशी शिक्षा के महत्व को रेखांकित करने के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं। उच्च शिक्षा हेतु बजट परिव्यय को बढ़ा दिया गया है और विश्वविद्यालयों जिनमें निजी विश्वव़िद्यालय भी शामिल हैं, को उत्कृष्ट केन्द्र के रूप में पहचान करने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। साथ ही सरकार शिक्षण के पेशे में सर्वोत्कृष्ट प्रतिभा को आकर्षित करने की भी इच्छुक है।

भारत में उच्च शिक्षा व्यापक विस्तार के दौर से गुजर रही है जिसके अंतर्गत छात्रों और संस्थानों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है और सरकारी वित्तपोषण में भी भारी वृद्धि हुई है। छात्रों की निरंतर बढ़ती हुई संख्या के लिए बेहतर उच्च शिक्षा के समान अवसर उपलब्ध कराने की भारी चुनौती क्षेत्रीय और सामाजिक असंतुलनों को दूर करने, संस्थानों को पुन:सुदृढ़ करने, उत्कृष्टता के नए मानदंड तैयार करने और ज्ञान की सीमाओं का विस्तार करने के लिए ऐतिहासिक अवसर भी है।

हमारी युवा आबादी को राष्ट्रीय पूँजी बनाने की दिशा में शिक्षा सबसे अधिक महत्वपूर्ण घटक है। यदि हमारे देश की युवा पीढ़ी का सशक्तीकरण होता है तो इससे आने वाले वर्षों के लिए बहुत ही सुदृढ़ और उपयोगी कार्यबल का निर्माण होगा।

आज नौकरी के बाजार में सभी स्तर पर मल्टी-टास्किंग एक आवश्यक अनिवार्यता बन गई है। प्रतिस्पर्धा का सामना करने की क्षमता और त्वरित प्रौद्योगिकीय परिवर्तनों के प्रति अनुकूलन ऐसे गुण हैं जिनकी आज हर व्यक्ति से अपेक्षा की जाती है। हमें डिजिटल प्रौद्योगिकी की तरफ जाने की आवश्यकता है और विश्वविद्यालयों को अपनी शिक्षण पद्धती बदलनी होगी तथा इस दिशा में प्रासंगिक पाठ्यक्रम अपनाने होंगे। शिक्षकों को अपने ज्ञान को नवीनतम बनाना होगा और उन्हें आई सी टी के प्रयोग को तेजी से सीखना होगा।

प्रौद्योगिकीय प्रगति और डिजिटल क्रांति के कारण आज विश्व अप्रत्याशित गति से बदल रहा है और उच्च शिक्षा संस्थानों से शिक्षित होकर निकल रहे छात्रों को इन बदलती हुई स्थितियों का सामना करने के लिए न केवल तकनीकी ज्ञान, बल्कि विश्लेषणात्मक कौशल, समालोचनात्मक सोच, रचनात्मकता और नवीन विचारों से भी युक्त होना चाहिए।

हमें यह याद रखना चाहिए कि विश्वविद्यालय कल के छात्र तैयार कर रहे हैं। जहां भी आवश्यक हो, वहां शिक्षण की पारंपरिक पद्धतियों के स्थान पर नवीन पद्धतियों को अपनाया जाना चाहिए क्योंकि किसी भी क्षेत्र में प्रगति करने के लिए केवल परिवर्तन ही सतत प्रक्रिया है। वस्तुत: छात्रों को पढ़ाने से लेकर परीक्षा आयोजित करने तक के सारे तरीकों का मूल्यांकन कर उनमें आमूल सुधार करना होगा। कक्षाओं को अधिक रोचक बना कर उन्हें शिक्षक-केन्द्रित व्याख्यान कक्ष के बजाय छात्रों के लिए पारस्परिक ज्ञान का केन्द्र बनाना चाहिए।

इसी प्रकार, समय आ गया है कि हम यह पता लगांए कि स्मरणशक्त्िाव-आधारित परीक्षाओं से कोई सार्थक उद्देश्य पूरा हो रहा है अथवा नहीं। मैं शिक्षा व्यवस्था से जुड़े सभी हितधारकों, यथा नीति-निर्माताओं, कुलपतियों, शिक्षण पद्धति के विशेषज्ञ, व्याख्याताओं और छात्रों से अपेक्षा करूंगा कि वे इस डिजिटल युग की आवश्यकताओं के अनुसार प्रासंगिक पाठ्यक्रम तैयार करने हेतु नवीन विचार और सुझाव लेकर आएं।

भारत एक समय 'विश्व गुरू' के रूप में जाना जाता था और ज्ञान-प्राप्ति का वैश्विक केन्द्र था क्योंकि विश्व के सभी कोनों से ज्ञान पाने के इच्छुक लोग भाग में तक्षशिला, नालंदा और अन्य केन्द्रों पर शिक्षा प्राप्त करने के लिए आते थे। मुगल आक्रमण और ब्रिटिश उपनिवेशीकरण के बाद स्थिति में हुए परिवर्तन पर ज्यादा कुछ न कहते हुए मैं इस बात पर बल देना चाहूंगा कि अब सही समय आ गया है कि भारत फिर से वैश्विक ज्ञान का केन्द्र बने।

इस सपने को साकार करने के लिए ज्ञान के केन्द्रों, विशेषकर विश्वविद्यालयों को अपनी शिक्षण पद्धति और अपने कार्यकरण को पूरी तरह से बदलना होगा तथा छात्रों को अपनी पसंद के पेशे में सुगमता से जाने अथवा उन्हें स्व-रोजगार हेतु सक्षम बनाने हेतु योग्य बनाना होगा। विभिन्न व्यावसायिक अवसरों की तलाश के लिए असीम संभावनाएं हैं और देश की जनसांख्यिकीय लाभ की स्थिति का पूरा उपयोग करने के लिए सही शिक्षा प्रदान करना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।

कभी-कभी मैं सोचता हूं कि विशेषज्ञता हासिल करने के क्रम में आधुनिक शिक्षा प्रणाली कहीं दृढ़ नैतिकता से युक्त संतुलित व्यक्ति बनाने में विफल तो नहीं हो रही है। क्या केवल डिग्री प्रमाणपत्र प्राप्त करने के लिए ही ज्ञान प्राप्त करना पर्याप्त है? स्पष्टत: नहीं, किंतु यही मनोवृत्ति आज माता-पिता और छात्रों के मन में घर कर गई है जिसे बदलना ही होगा। हमें इस प्रकार की संकीर्ण सोच से बाहर निकलना होगा। वस्तुत: उच्च शिक्षा के संस्थानों से निकलने वाला हर छात्र एक पुनर्जागरण पुरुष की तरह होना चाहिए - एक ऐसा व्यक्तित्व हो जो विभिन्न क्षेत्रों का ज्ञाता हो और बहु-कौशल प्रवीण हो।

"शिक्षा से मेरा अभिप्राय बच्चे का सर्वांगीण विकास तथा व्यक्ति के शरीर, मन और आत्मा का सर्वतोमुखी विकास से है," यह बात राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कही थी। उन्होंने यह भी कहा था - "जो शिक्षा चरित्र का विकास न करे, वह व्यर्थ है।" जैसा कि महात्मा गांधी ने ठीक ही कहा था कि किसी भी व्यक्ति के लिए सही मार्ग का चुनाव करने में चरित्र का सर्वाधिक महत्व है। अन्यथा सर्वश्रेष्ठ शैक्षणिक संस्थानों से भी शिक्षा पाकर भी व्यक्ति का अपने जीवन में पथभ्रष्ट होने का खतरा बना रहता है। महान तमिल कवि और दार्शनिक तिरुवल्लुवर ने कहा था : "एक अशिक्षित व्यक्त्िात बंजर भूमि की तरह है। उसका जीवन तुच्छ और निरर्थक होता है।"

मेरे प्यारे युवा मित्रों, कृपया यह स्मरण रखिए कि चरित्र, योग्यता, क्षमता, आचरण, करूणा, कठिन परिश्रम और अनुशासन ऐसे महत्वपूर्ण गुण हैं जो सफलता हासिल करने और सपनों को साकार करने के लिए आवश्यक है।

यह आपके जीवन का सबसे अहम दिन होने के साथ-साथ अपने भविष्य की योजना तैयार करने का अवसर भी है। सफलता हासिल करने के लिए कभी भी छोटे रास्ते मत चुनिए। तुरंत कॉफी की तरह सफलता तुरंत नहीं मिलती। सच्चाई, धैर्य, समर्पण और लगन से ही अंतत: सफलता हासिल होगी। बड़े सपने देखने का साहस रखिए, जैसा कि हमारे भूतपूर्व राष्ट्रपति डा. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम हमेशा कहा करते थे। अज्ञात क्षेत्रों को चुनने में भी कोई बुराई नहीं है, लेकिन लक्ष्य को हासिल करने के लिए आपको जुनून, दृढ़ इच्छा, विश्वास और आत्मविश्वास से लबरेज होना होगा।

मित्रो, भारत महत्वपूर्ण आर्थिक शक्ति बनने की दहलीज पर खड़ा है। असंख्य अवसर है और आप सभी को उनका लाभ उठाते हुए नवीन भारत के निर्माण में अपना योगदान देना होगा। एक ऐसा भारत जो भ्रष्टाचार, गरीबी, जातिवाद, प्रांतीयता, धार्मिक उन्माद और स्त्री-पुरुष के विभेद से मुक्त हो। इस वैश्वीकृत ज्ञान-प्रधान अर्थव्यवस्था में भारत अपनी विशिष्ट शिक्षित युवा आबादी के कारण सभी देशों के समूह में श्रेष्ठ और लाभप्रद स्थिति में है। आइए हम सब मिलकर इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए गंभीर प्रयास करें।

किसी विश्वविद्यालय की उपलब्धियों को आंकने के लिए शोध और नवोन्मेषी उपाय महत्वपूर्ण मानदंड बन गए हैं। बेहतर शिक्षा प्रदान कर एसआरएम यूनिवर्सिटी ने भारत के निजी विश्वविद्यालयों में अपने लिए विशिष्ट पहचान बनाई है।

मुझे बताया गया है कि यह यूनिवर्सिटी प्रत्येक वर्ष 15 करोड़ रुपए तक की छात्रवृत्ति प्रदान करता है। यह यूनिवर्सिटी प्रबंधन का शैक्षणिक रूप से प्रतिभाशाली और समाज के आरंभिक रूप से वंचित वर्गों की तरफ मदद का हाथ बढ़ाने का रूझान दर्शाता है। मैं कुलाधिपति की उनकी सामाजिक दृष्टि और महानुभावों के लिए सराहना करता हूं।

प्रिय छात्रों, आपके लिए इस प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय से स्नातक शिक्षा पूरी करने और भावी चुनौतियों का सामना करने के लिए यहां पर अपेक्षित कौशल सीखने निश्चित रूप से एक गौरवपूर्ण क्षण है। आपकी यात्रा केवल डिग्री हासिल करने तक ही सीमित न होकर जीवन में बहुत बड़े लक्ष्य हासिल करने की होनी चाहिए। आपने इस संस्थान से न केवल ज्ञान प्राप्त किया है, बल्कि कई अतिरिक्त कौशल भी सीखे हैं।

जीवन में आगे बढ़ते हुए आपके समक्ष पर्याप्त संभावनाएं और अवसर होंगे। ज्ञान और विवेक दोनों आवश्यक हैं। एक आपको आजीविका अर्जित करने में मदद करता है और दूसरा आपको जीवन जीने में।
आपको हार्दिक शुभकामनाएं। जय हिन्द!"