23 जून, 2018 को नई दिल्ली में अंतर्राष्ट्रीय विधवा दिवस समारोह के अवसर पर भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

नई दिल्ली | जून 23, 2018

"आरंभ में मैं विधवाओं और उनके बच्चों के उत्थान के लिए विशेष रूप से काम करने के लिए लूम्बा फाउंडेशन की सराहना करता हूँ। चूंकि दुनिया भर में लाखों विधवाएं हैं, इसलिए न केवल ऐसे धर्मार्थ संगठनों की और अधिक आवश्यकता है, बल्कि सरकार द्वारा भी उनके कल्याण पर और अधिक ध्यान केंद्रित किए जाने की आवश्यकता है।

वैधव्य संभवतः किसी व्यक्ति के जीवन में सबसे दुखद अवस्था है फिर चाहे वह पुरुष हो या महिला। दुर्भाग्य से विभिन्न कारणों से यह महिलाओं में अधिक विपत्ति लाता है, जो उस देश, जहां की वे हैं, के सामाजिक-सांस्कृतिक रीति-रिवाजों एवं मानकों पर निर्भर करता है। भारत में भी विधवाएं अत्यधिक हाशिए पर रहने वाला और उपेक्षित वर्ग हैं और यह वर्ग भेदभाव और शोषण का सामना करता है। हजारों मामलों में, विधवाओं को न केवल खुद को बचाना पड़ता है बल्कि अपने बच्चों का भी ख्याल रखना पड़ता है।

2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, भारत में लगभग 4.3 करोड़ विधवाएं हैं जो कुछ देशों की जनसंख्या के बराबर हैं। उनके साथ विशेष देखभाल, करुणा और सहानुभूति का बर्ताव करने की आवश्यकता है क्योंकि उन्होंने न केवल अपने सबसे प्रियजनों को खो दिया है बल्कि अचानक उन्हें आर्थिक और भावनात्मक संकट का सामना करना पड़ रहा है और जीवन के बर्बाद हो जाने वाले खालीपन और निरर्थकता का सामना भी करना पड़ता है।

यह चिंता का विषय है कि विधवाओं को हेय दृष्टि से देखा जाता है और कभी-कभी वर्तमान डिजिटल युग में भी उनके साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार किया जाता है।

भारत में कई प्रगतिशील सुधारक रहे हैं जिन्होंने विधवाओं के कल्याण और उद्धार के लिए अथक रूप से काम किया है। उदाहरण के लिए, ईश्वर चंद्र विद्यासागर विधवाओं के पुनर्विवाह के अग्रदूत बनें। इस श्रेणी के अन्य लोगों में राजा राम मोहन राय और जाने-माने तेलुगू समाज सुधारक कंदुकुरी वीरसेलिंगम शामिल हैं जिन्होंने विधवाओं के पुनर्विवाह को भी बढ़ावा दिया था और विधवा गृह भी स्थापित किया था। उन्होंने उस समय के रूढ़िवादी समाज के पूर्वाग्रहों को दूर करने के भागीरथ प्रयास किए थे।

वर्तमान समय में सबसे अधिक आवश्यकता महिलाओं के लिए आजीविका कौशल और उनके बच्चों के लिए शिक्षा प्रदान किया जाना है। मुझे पता है कि केंद्र सरकार और विभिन्न राज्य सरकारों ने पेंशन, आश्रय प्रदायगी और कौशल विकास कार्यक्रमों को आरंभ करके विधवाओं को सशक्त बनाने के लिए विभिन्न कदम उठाए हैं। मुझे खुशी है कि केंद्र सरकार एक राष्ट्रीय योजना के तहत विधवाओं को मासिक पेंशन प्रदान कर रही है।

आवास और भूमि वितरण जैसी समाज कल्याण योजनाओं के तहत हकदारी महिलाओं के नाम पर दिये जाने की आवश्यकता है और विधवाओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।उन्होंने कहा कि इस तरह के उपाय उन्हें सशक्त बनाने में मदद करेंगे।

विधवाओं के समक्ष पेश आने वाली कुछ प्रमुख समस्याओं में विधवा पुनर्विवाह पर सामाजिक प्रतिबंध और उत्तराधिकार संबंधी अधिकारों से इनकार करना भी शामिल हैं।

2011 की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक 58 प्रतिशत विधवाएँ 60 साल से ऊपर की, 32 प्रतिशत 40 से 59 साल के बीच की, 09 प्रतिशत 20-39 साल के आयु वर्ग की हैं और एक नगण्य समूह 1 9 साल से कम की विधवाओं का है।

चूंकि लगभग एक-तिहाई विधवाएँ 40-59 वर्ष आयु वर्ग में हैं इसलिए सरकार को कौशल विकास को बढ़ावा देना चाहिए और सिलाई, परिधान बनाने और पैकेजिंग समेत विभिन्न क्षेत्रों में व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से आजीविका के अवसर पैदा करने चाहिए। निर्धन विधवाओं को स्वनियोजित बनाने के लिए ऋण प्रदान करके उन्हें वित्तीय रूप से सशक्त बनाए जाने की आवश्यकता है। मुद्रा ऋण देते हुए विधवाओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। मुझे खुशी है कि हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्य प्रतियोगी परीक्षाओं के माध्यम से सरकारी नौकरियाँ देने में विधवाओं को प्राथमिकता दे रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अन्य राज्यों द्वारा इसका अनुकरण किया जाना चाहिए।

जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, विधवाओं को सशक्त बनाने के महान कार्य में गैर-सरकारी संगठनों और निजी क्षेत्र की बड़ी भागीदारी की आवश्यकता है। निजी क्षेत्र को कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्व (सीएसआर) निधियों के कुछ अंश को विशेष रूप से विधवाओं के कल्याण के लिए उद्दिष्ट करना चाहिए।

विधवाओं के बच्चों को शिक्षा प्रदान करना एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू है जिसपर विशेष रूप से ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। यहां भी सरकार, नागरिक समाज और निजी क्षेत्र को ऐसे बच्चों के साथ अधिमान्य व्यवहार करने के लिए एक साथ आना चाहिए।

बहनों और भाइयों,

मुझे खुशी है कि लूम्बा फाउंडेशन ने विधवाओं की आर्थिक स्थिति में सुधार लाने के लिए अनेक पहल की हैं। वस्तुतः एक समाज के रूप में हम विधवाओं के प्रति सामाजिक मनोवृत्ति और विधवापन से जुड़े कलंक, अपमान और एकाकीपन को किस प्रकार दूर कर सकते हैं, इसपर विचार करने की आवश्यकता है। यह लैंगिक भेदभाव के साथ जुड़ा हुआ है जो समकालीन भारतीय समाज में दुर्भाग्यपूर्ण रूप से गुप्त रूप में जारी है।

लड़कियों और महिलाओं को अच्छी शिक्षा और आजीविका के अवसरों तक बराबर और न्यायसंगत पहुंच प्रदान किए जाने की आवश्यकता है। नए भारत की अवधारणा में आर्थिक रूप से स्वतंत्र महिलाएं शामिल हैं और यदि यह स्वप्न चरितार्थ हो जाए तो महिलाओं पर अत्याचार और विधवाओं की उपेक्षा जैसी कई सामाजिक बुराइयाँ अतीत की बात बन सकती हैं।

जय हिन्द!"