01 जून, 2018 को नई दिल्ली में दीनदयाल रिसर्च इंस्टीट्यूट द्वारा आयोजित 8वें नानाजी मेमोरियल व्याख्यान में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु का संबोधन

नई दिल्ली | जून 1, 2018

“मैं 8वां नानाजी स्मारक व्याख्यान देना सम्मान की बात और अपना सौभाग्य समझता हूँ।

नानाजी देशमुख आधुनिक भारत के लब्धप्रतिष्ठ व्यक्तित्वों में से एक हैं जिन्होंने लाखों भारतीयों को राष्ट्रनिर्माण के लिए अपने-आपको समर्पित करने की प्रेरणा दी है और दे रहे हैं। उन लाखों लागों में से मैं भी एक हूँ।

वहा एक अनोखे व्यक्ति थे जिन्होंने देशहित को सबसे ऊपर रखा।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द मोदी ने कहा है कि राष्ट्रनिर्माण के प्रति उनकी कटिबद्धता और समर्पण बेमिसाल थी और सादगी की पराकाष्ठा थे।

नानाजी ने अपने बचपन के दौरान कठिनाईयों का सामना किया और शिक्षा के लिए अपने उत्साह के कारण उन्होंने सब्जियां बेचीं और अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए धनोपार्जन किया। इस संघर्ष और ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों के जीवन में प्रकाश लाने की उनकी इच्छा ने उन्हें सामाजिक कार्य करने के लिए प्रेरित किया।

वे सचमुच एक राजर्षि, उत्कृष्ट सामाजिक कार्यकर्ता और मात्र बोलने वाले नहीं, बल्कि करने वाले व्यक्ति थे। उनका कार्य आज भी देश भर के सैंकड़ों लागों के लिए प्रेरणास्रोत है।

मैं उनसे नजदीक से जुड़ा था और हमेशा उनके सामाजिक दर्शन का प्रशंसक रहूँगा। वे कहा करते थे, "मेरा जीवन अपने लिए नहीं अपितु दूसरों के लिए हैं और ये दूसरे कौन हैं - वे हमारे समाज के दलित और अपे‍क्षित वर्ग हैं।"

आदरणीय नानाजी ने 1968 में अपने सहयोगी दीनदयाल जी की पुण्य स्मृति में दीनदयाल शोध संस्थान की स्थापना की। संस्थान दीन दयाल जी के अन्त्योदय, ग्रामोदय जैसे संकल्पों को सिद्ध करने की दिशा में प्रयासरत है। "मैं अपने लिए नहीं, अपनों के लिए हूँ। अपने वे हैं जो पीड़ित और उपेक्षित हैं।" नानाजी का यह दर्शन ही संस्थान का आदर्श वाक्य है।

नानाजी का विश्वास था और इसे उन्होंने चित्रकुट में अपने कार्यों और कार्यक्रमों के माध्यम से प्रदर्शित किया कि जब तक प्रत्येक व्यक्ति को राष्ट्र के प्रति योगदान करने के लिए सशक्त नहीं बनाया जाता है; एक आत्मनिर्भर राष्ट्र का निर्माण नहीं किया जा सकता है।

वे स्वास्थ्य और शिक्षा, कृषि समेत सभी क्षेत्रों में देश के समेकित और समग्र विकास में लोगों की सक्रिय भागीदारी में विश्वास करते थे।

उन्होंने इसे सुप्त, आदर्श स्वप्न नहीं रहने दिया।

वे दूरद्रष्टा दार्शनिक और मिशन के साथ संगठनकर्ता दोनों थे। उन्होंने जमीनी स्तर पर पंडित दीन दयाल उपाध्याय के एकात्म मानवतावाद की अवधारणा को सफलतापूर्वक कार्यरूप दिया और ग्रामीण भारत के विकास की अपनी अवधारणा को आकार देने के लिए उन्होंने 1968 में दीनदयाल शोध संस्थान (डी आर आई) की स्थापना की।

प्रिय बहनों और भाइयों, हमने अपने-आपको एक महान संविधान दिया है जिसकी प्रस्तावना में हमने एक संप्रभु समाजवादी पंथ निरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए और उसके समस्त नागरिकों को न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व प्रदान करने का दृढ़ संकल्प लिया है।

हमने देश के ऐसे लोकतंत्रात्मक भविष्य की परिकल्पना की है जिसमें हम अर्थात जनता केन्द्र में हैं। हम लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करने के लिए सामूहिक रूप से एक साथ कार्य कर रहे हैं। हमारे प्राचीन भारतीय विचार मानवता, बहुलतावाद और अध्यात्मवाद पर आधारित हैं। बाद के अनेक विचारकों द्वारा इसे रेखांकित किया गया है। इस वैश्विक दृष्टि के केन्द्र में यह विश्वास है कि मानव सशक्तीकरण महत्वपूर्ण है और व्यक्ति के सभी आयामों का समेकित विकास समाज और राष्ट्र के विकास के लिए महत्वपूर्ण है।

बहनों और भाइयों, आप जानते हैं कि स्वाधीन भारत का संविधान समाज के समावेशी विकास का दस्तावेज है।

संविधान सभा में नये संविधान का प्रारुप प्रस्तुत करते हुये डॉ. अंबेडकर ने समाज के समक्ष आने वाले विरोधाभासों पर चिंता जाहिर की थी, उन्होंने कहा था:

"26 जनवरी 1950 को, हम विरोधाभासों के जीवन में प्रवेश करने जा रहे हैं। राजनीति में समानता होगी और सामाजिक और आर्थिक जीवन में असमानता होगी .... हमें यथाशीघ्र इस विरोधाभास को दूर करना होगा या अन्यथा असमानता से पीड़ित लोग राजनीतिक लोकतंत्र के उस ढांचे को ध्वस्त कर देंगे जिसे इस संविधान सभा ने इतनी मेहनत से बनाया है। "

अत: यह वृहत्तर समाज का पुनीत संवैधानिक कर्तव्य है कि विकास समावेशी और सर्वस्पर्शी हो। दीनदयाल जी की अन्त्योदय की परिकल्पना और नानाजी के ग्रामीण स्वावलंबन के प्रयास इसी आदर्श से प्रेरित हैं।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय की अखंड मानवतावाद की अवधारणा और नानाजी देशमुख द्वारा जमीनी स्तर पर इसकी प्रयोज्यता देश के विकास में लोगों की सर्वोच्च भूमिका को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करती है।

नानाजी ने लोगों को विकास के केंद्र में रखा और वह चाहते थे कि समाज नेतृत्व करे। वह ग्रामीण क्षेत्रों को आर्थिक गतिविधियों के फलते –फूलते केंद्रों में बदलने के लिए सामूहिक उत्तरदायित्त्व और सामूहिक प्रयासों में विश्वास करते थे। एक तरह से, वह आज के कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के अग्रदूत थे और उन्होने उन दिनों में कई उद्योगपतियों को सामाजिक कार्यों में योगदान देने के लिए प्रेरित किया था।

प्रिय बहनो और भाइयो,

शासन प्रणाली पर पुनर्विचार करने का समय आ गया है।

आज हमारे पास एक अनूठा अवसर है।

व्यापक और दूरगामी सुधारों से देश बदल रहा है ।

लोग सेवा प्रदायगी के नए तरीकों की उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहे हैं। वे विकास के लाभ के निष्क्रिय प्रापक होने से संतुष्ट नहीं हैं।

वे परिवर्तन के सक्रिय अभिकर्ता बनना चाहते हैं।

वे नये पेड़ लगाना चाहते हैं।

हमें इस सकारात्मक ऊर्जा, सामूहिक इच्छा और महत्वाकांक्षी आदर्शवाद का राष्ट्र विकास के लिए उपयोग करना चाहिए।

वर्तमान सरकार का स्वच्छ भारत कार्यक्रम देश में बदलाव लाने में लोगों की भागीदारी का एक उदाहरण है। स्वच्छ भारत अब जन आंदोलन बन गया है और जनता- जानी मनी हस्तियों से आम आदमी तक - की मानसिकता को बदलने में काफी योगदान दे रहा है।

स्वतंत्रता के 70 वर्षों के बाद भी आज, देश को गरीबी, निरक्षरता, युवाओं के बीच कौशल की कमी और शहरी-ग्रामीण विभाजन जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इन चुनौतियों को दूर करने के लिए सामूहिक प्रयासों को करने की आवश्यकता है और लोगों को सरकार के प्रयासों को पूरा के लिए अग्रणी भूमिका निभानी चाहिए।

वास्तव में, संविधान में नागरिकों के कई मौलिक कर्तव्यों का उल्लेख है और उनमें से एक व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करना है जिससे राष्ट्र निरंतर बढ़ते हुए प्रयत्न और उपलब्धि की नई ऊँचाइयों तक उठ सके।"

लोकतंत्र की जड़ों और बहुलवाद को मजबूत करने के लिए, विभिन्न सामाजिक स्तरों के लोगों के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वे एक समानतावादी, स्वस्थ, समावेशी और उत्तरदायी समाज बनाने की दिशा में एक ईमानदार तरीके से योगदान करें। प्रगति केवल तभी हासिल की जा सकती है जब शांति, सामाजिक, सांप्रदायिक और सांस्कृतिक सद्भाव हो।

हम जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा और कई अन्य कारकों से अवगत हैं जो लोगों को आपस में बाँट सकते हैं।

यह ऐसा कारण ढूंढने का उपयुक्त समय है जो हमें एकजुट रख सके, जिसके चलते हम टीम इंडिया के रूप में काम कर सकें। और उस कारण को खोजना मुश्किल काम नहीं है। वास्तव में, हमारे समक्ष कई चुनौतियां बनी हुई हैं।

अगर हम अपनी शासन प्रणाली में सुधार कर सकते हैं, तो हम अपने जीवन में बदलाव ला सकते हैं।

यदि हम उत्पादन और परिणामों पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं, यदि हम अनुत्पादक और प्रतिकूल क्रियाओं पर अपनी ऊर्जा और बहुमूल्य संसाधनों को बर्बाद करने से बच सकते हैं, यदि हम विरोध करने के बजाय सहयोग कर सकते हैं, यदि हम अपनी व्यक्तिगत क्षमताओं को एकजुट करने के बारे में सोच सकते हैं, तो हम तेजी से विकास कर सकते हैं।

सरकार एक समर्थकारी ढांचा बनाती है, अवसंरचना प्रदान करती है, गति देती है, गुणवत्ता की निगरानी करती है और सार्वजनिक भागीदारी को प्रोत्साहित करती है।

सभ्य समाज को सामाजिक कायाकल्प में, जागरूकता बढ़ाने, व्यवहार को बदलने और जीवन की बेहतर गुणवत्ता प्राप्त करने के दृष्टिकोण को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी।

प्रिय बहनों और भाइयों,

देश को भारत की प्रगति में प्रत्येक नागरिक को गौरवान्वित साझेदार बनने के लिए प्रेरित करने और सशक्त बनाने के लिए देश को जमीनी स्तर पर नानाजी जैसे नि:स्वार्थ नेताओं की जरूरत है।

देशमुख जैसे कर्मयोगी, धन्यजीवी, यदि काम करते रहेंगे तो देश का मुखचित्र बदलेगा और नया सक्षम भारत उभरेगा।

नानाजी के शानदार उदाहरण से प्रेरित, मैं युवाओं, किसानों और महिलाओं के कल्याण के लिए समर्पित स्वयंसेवी संगठन स्वर्ण भारत ट्रस्ट से सक्रिय रूप से जुड़ा रहा हूं। हर बार जब मैं इस उल्लेखनीय सामाजिक सेवा संस्थान में जाता हूं तो मैं फिर से नव जीवन से परिपूर्ण हो जाता हूँ।

जब हम स्वर्गीय श्री नानाजी देशमुख और स्वर्गीय श्री दीन दयाल उपाध्याय के बारे में बात करते हैं, तब यह जानना अच्छा होगा कि भारत को बदलने का उनका दृष्टिकोण, दर्शन और मिशन कैसे विकसित हुआ और कैसे वे समाज और राष्ट्र के उद्देश्य के लिए स्वयं को समर्पित करने के लिए प्रेरित हुए। मुझे लगता है कि यह अनिवार्य रूप से उनका सुदृढ़ राष्ट्रवादी उत्साह और आदर्शवाद है जो उन्हें कई अन्य नेताओं से अलग करता है। इस जुनून की जड़ें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और इसके वैचारिक आधार में निहित हैं।

इस दुनिया के सबसे बड़े स्वयंसेवी मिशनरी संगठन ने उन सभी को आकर्षित किया है जिन्होंने नानाजी और दीन दयाल उपाध्याय जी की तरह देश को अन्य सभी चीज़ों से ऊपर रखा है। यहां तक कि महात्मा गांधीजी ने भी आरएसएस द्वारा प्रस्तावित सकारात्मक मूल्यों को स्वीकार किया था। 1934 में बापू ने कहा था:

"जब मैंने आरएसएस शिविर का दौरा किया, तो मैं आपके अनुशासन, और अस्पृश्यता की गैरमौजूदगी से बहुत आश्चर्यचकित था"। उन्होंने स्वयंसेवकों से व्यक्तिगत रूप से इस बारे में पूछताछ की और पाया कि स्वयंसेवक एक दूसरे की जाति पर ध्यान दिए बिना शिविर में एक साथ रह रहे थे और भोजन कर रहे थे।

सार्वजनिक जीवन में मेरी स्वयं की शुरुआत आरएसएस के माध्यम से थी। इस संगठन ने मुझे जीवन, मूल्यों, हमारी संस्कृति और राष्ट्र तथा राष्ट्र और साथी नागरिकों के प्रति मेरे कर्तव्यों के बारे में बहुत कुछ सिखाया। इसने मुझे मानवता का एक परिप्रेक्ष्य, जीवन के उद्देश्य की भावना और सकारात्मक कार्रवाई के लिए एक ढांचा प्रदान किया। मेरी तरह, हजारों लोगों ने सार्वजनिक कार्य क्षेत्र में अपना जीवन व्यतीत किया है।

आरएसएस के साथ मेरे संबद्ध होने से, मैं आपको सभी को आश्वस्त कर सकता हूं कि आरएसएस स्वयं आत्म-अनुशासन, आत्म-सम्मान, आत्मरक्षा, आत्मनिर्भरता, सामाजिक सुधार, सामाजिक चेतना, सामाजिक आंदोलन, निःस्वार्थ सेवा के लिए पूर्णत: समर्पित है और ये सभी के राष्ट्र के सर्वोपरि होने के दर्शन द्वारा मार्गदर्शित हैं । मुझे नहीं लगता कि किसी भी व्यक्ति को इन सिद्धांतों पर कोई आपत्ति हो सकती हो जिनका मुख्य उद्देश्य मूल प्राचीन भारतीय आचारों और मूल्यों के आधार पर चरित्र का विकास करना है और जो 'वसुधैव कुटुम्बकम' के दर्शन की वकालत करते हैं, जिसका अर्थ है कि पूरी दुनिया एक परिवार है।

स्वर्गीय श्री जयप्रकाश नारायण ने 1977 में आरएसएस के बारे में कहा, और मैं उसे उद्धृत करता हूँ कि "अकेले आरएसएस में समाज को बदलने, जातिवाद को समाप्त करने और गरीबों की आंखों से आँसू पोछने की क्षमता है। मुझे इस क्रांतिकारी संगठन से काफी उम्मीदें हैं जिसने एक नया भारत बनाने की चुनौती स्वीकार की है। "

अंत में, मैं नानाजी के इस स्मृति व्याख्यान के संचालन के लिए दीन दयाल अनुसंधान संस्थान को बधाई देना चाहता हूं। इस महान भारतीय नेता को सच्ची श्रद्धांजलि उनके कर्मों को याद करना, उनके कथनों का अनुसरण करना और उस आलोकित मार्ग पर पुन: चलना जिसपर वे जीवन भर चलते रहे।

जय हिन्द!"